नोताडा.कस्बे म परम्परा के अनुसार घासभैरू बाबा की सवारी निकाली गई। मंगलवार शाम को गांव के पंच पटेल ढोल नगाड़ों के साथ घासभैरू चोक में पहुंचे और शुभ मुहूर्त में रात्रि को पूजा अर्चना के बाद घासभैरू की पूजा अर्चना करके सवारी की शुरुआत की ।
सवारी रात को बावड़ी पर आकर मचल गई। शराब की धार चढ़ाकर मान मनुहार की गई, लेकिन आगे नहीं बढ़ी जिसके बाद रात्रि विश्राम बावड़ी पर ही करवाया गया। आज बुधवार को अलसुबह ही ग्रामीणों घासभैरू की सवारी निकालने के लिए उमड़ पड़े आज दिनभर गांव में घासभैरू बाबा की सवारी को गांव के बाहर से नगर भ्रमण करवाया जाएगा।
बैलों के अभाव में हाथों से खेचना पड़ रहा घासभैरू
बुजुर्गों के अनुसार घास भैरू की सवारी को पहलें बैलों की जोडिय़ां जोतकर खेचा जाता था और उनपर फटाखे फोड़े जाते थे तो बैल बिदककर इधर उधर भागते थे ।यह नजारा देखकर लोग रोमांचित हो उठते थे लेकिन अब मशीनरी युग में किसानों ने बैल रखना छोड़ दिया इस वजह से अब हाथों से ही घासभैरू को खेचकर घुमाया जाता है।
घासभैरू नहीं पहुंचेगा तब तक नहीं होगा दोज पूजन
इस गांव की परम्परा रही है की जब तक घासभैरू नगर भ्रमण कर अपने स्थान पर नहीं पहुंचेगा तब तक कोई भी मशीनरी खेत में नही चलाई जाती है तथा महिलाएं भी दोज का पुजन नहीं करती है। पहले के समय में गांव के एक परिवार ने घासभैरू के पहुंचने से पहले ही बैलों का पुजन कर लिया था तो बैलों की तुरंत मौत हो गई थी। इसलिए आज भी यह परम्परा कायम है।