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Statue of maa saraswati : चार शताब्दी पुरानी हंस पर सवार मां सरस्वती की प्रतिमा व छतरी को संरक्षण की दरकार

विद्या की देवी मां सरस्वती की पाषण पर तराशी प्रतिमाएं कुछ स्थानों पर देखने को मिलती है। नैनवां में भी रियासतकालीन शम्भू बाग में छतरी के नीचे गर्भगृह में चार शताब्दी पुरानी हंस पर सवार मां सरस्वती की प्रतिमा तो मौजूद है, लेकिन सरस्वती घर का छतरी ढह गई। रियासतकाल में मां सरस्वती के सामने बैठकर उस काल के कवि व साहित्यकार काव्य रचना किया करते थे।

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चार शताब्दी पुरानी हंस पर सवार मां सरस्वती की प्रतिमा व छतरी को संरक्षण की दरकार

चार शताब्दी पुरानी हंस पर सवार मां सरस्वती की प्रतिमा व छतरी को संरक्षण की दरकार

नैनवां. विद्या की देवी मां सरस्वती की पाषण पर तराशी प्रतिमाएं कुछ स्थानों पर देखने को मिलती है। नैनवां में भी रियासतकालीन शम्भू बाग में छतरी के नीचे गर्भगृह में चार शताब्दी पुरानी हंस पर सवार मां सरस्वती की प्रतिमा तो मौजूद है, लेकिन सरस्वती घर का छतरी ढह गई। रियासतकाल में मां सरस्वती के सामने बैठकर उस काल के कवि व साहित्यकार काव्य रचना किया करते थे।

अब छतरी व मां सरस्वती की प्रतिमा की सुध नहीं लेने वाला कोई भी नहीं। संरक्षण नहीं मिल पाया तो छतरी धराशायी हो गई। रियासतकाल में नैनवां बूंदी रियासत के अधीन रहा। जिस प्रकार शासक कला व संस्कृति प्रेमी थे, वैसे ही उनके किलेदार भी कला व संस्कृति के प्रेमी होने से कस्बे में बावडिय़ों का निर्माण कराकर उनमें संस्कृति के प्रतीक स्थापित किए।


इसी कड़ी में इसका निर्माण कराया। बावड़ी के दरवाजे पर एक ओर मां सरस्वती तो दूसरी और गणपति की प्रतिमा पर छतरी का निर्माण हुआ। सरस्वती के मंदिर पर बनी छतरी ढह गई तो गणेश मन्दिर के ऊपर की छतरी क्षतिग्रस्त होने से ढहने के कगार पर आ गई।


छतरियों का निर्माण व उनमें प्रतिमाओं की स्थापना कब हुई इसके पुख्ता प्रमाण तो नहीं मिलते, लेकिन जानकारों के अनुसार सत्रहवीं शताब्दी में नैनवां के किलेदार रहे। शम्भूसिंह ने कस्बे के परकोटे बाहर बावड़ी का निर्माण कराया था तो बावड़ी के गेट पर छतरी का निर्माण करवाकर छतरी के नीचे के हिस्से में सरस्वती की प्रतिमा स्थापित की थी।


कला कृतियों को कुतर रही दीमक
बावड़ी के अन्दर भी झरोखों में भी पाषण पर उकेरी कलाकृतियां है। जिनको भी संरक्षण नहीं मिल पाने से कलाकृतियों को दीमक चट करती जा रही है। कहते है कि पाषण को दीमक नुकसान नहीं पहुंचा सकती, लेकिन यहां पर पाषण की प्रतिमाओं को ही दीमक ने चट कर डाला। किसी कलाकृति के मुंह को तो किसी के पैरों को नष्ट किया जा चुका है। एक झरोखें में नंदी पर सवार शिव-पार्वती की कलाकृतियों को दीमक नष्ट करती जा रही है।

काव्य रचना में जिक्र
बूंदी रियासत में राजकवि रहे पं. कुंजबिहारीलाल के लिखे काव्य में शम्भूबाग के साथ छतरी व उसमें स्थापित सरस्वती की प्रतिमा का जिक्र मिलता है। राजकवि भी सरस्वती की प्रतिमा के सामने बैठकर ही काव्य रचना किया करते थे। हंस पर सवार इसका में छतरी पर लगे पत्थरों पर विभिन्न प्रकार की शिल्पकला उकरी हुई थी।