जिले से 70 किलोमीटर दूर स्थित करवर कस्बे की पहचान यहां की प्राचीन बावड़ियों, कुंड व मन्दिरों से है।
बावड़ियों, कुंड व मंदिरों से है करवर की पहचान
संरक्षण के अभाव में जर्जर अवस्था में पहुंची बावडिय़ां
भूपेन्द्र नागर
patrika.com
करवर. जिले से 70 किलोमीटर दूर स्थित करवर कस्बे की पहचान यहां की प्राचीन बावड़ियों, कुंड व मन्दिरों से है। वहीं कस्बे के बीचों-बीच गढ़ बना हुआ है, जो वर्तमान में जर्जर हालत में है। कस्बे में करीब दस प्राचीन बावडिय़ां, एक कुंड व 6 प्राचीन मंदिर है। बावड़ियां संरक्षण के अभाव में जर्जर अवस्था में है। जिनको सार-संभाल की जरूरत है। बरसात के दिनों में जब यह कुंड व बावडिय़ां पानी से भर जाती है तो युवा नहाने का लुत्फ उठाया करते है। लेकिन कई बावड़ियां व कुंड अब जर्जर दिखने लगे हैं।
यह है इतिहास
करवर के संस्थापक महाराज मोहकम सिंह को माना गया है। राजा इंद्रसाल ने छोटे भाई मोहकम सिंह तथा करीब 200 सैनिकों को साथ लेकर करवर के पूर्व सरदारों को परास्त कर इस क्षेत्र पर अपना अधिकार जमाया। महाराजा मोहकम सिंह को करवर बक्शा गया। मोहकम सिंह बड़े ही महत्वाकांक्षी व पुरुषार्थी क्षत्रिय थे। कस्बे की आबादी करीब सात हजार है।
पुलिस थाना किराए के भवन में संचालित
कस्बे का पुलिस थाना पिछले नौ सालों से विद्यालय भवन में संचालित है। भवन में आवास व्यवस्था व संसाधनों के लिए पर्याप्त कमरे व मेस व्यवस्था नहीं होने के कारण पुलिसकर्मियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। पुरानी चौकी भवन में मेस व्यवस्था होने से चौकी व थाने के बीच पुलिसकर्मियों की भागदौड़ बनी रहती है। आंतरदा रोड पर थाने के लिए जगह आवंटित है। लेकिन बजट के अभाव में थाना भवन नहीं बन पा रहा है। वहीं आवंटित भूमि भी अतिक्रमण की चपेट में है।
सुविधाओं को तरसता सामुदायिक चिकित्सालय
कस्बे में स्थित सामुदायिक चिकित्सालय में एक्सरे, सीबीसी व अन्य जांचों की सुविधा नहीं है। सडक़ व अन्य दुर्घटनाओं में घायल मरीजों को कोटा, बूंदी या सवाईमाधोपुर के लिए रैफर करना पड़ रहा है। महिला चिकित्सक का पद रिक्त है। ग्रामीणों को सामुदायिक चिकित्सालय होते हुए भी केवल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जैसी सुविधाएं मिल रही है।
गौण मंडी की भूमि अतिक्रमण की भेंट
कस्बे में गौण मण्डी जनप्रतिनिधियों, प्रशासन की उदासीनता व विभागीय अनदेखी के चलते एक दशक बीत जाने के बाद भी शुरू नहीं हो पाई है। वहीं मंडी के लिए आवंटित भूमि विकास को तरस रही है। दिनोंदिन भूमि पर कब्जे, अवैध अतिक्रमण हो रहे हैं। ऐसे में मंडी का विकास थमा हुआ है। राजनीतिक दल मंडी का श्रेय लेने की होड़ में दो बार उद्घाटन हुए, लेकिन हालात जस के तस बने हैं।
गर्मी के दिनों में पानी के लिए मारामारी
कस्बे में पेयजल व्यवस्था ठीक नहीं है। गर्मी के दिनों में ग्रामवासियों को पानी के लिए दूर दराज भटकना पड़ता है। कस्बे को पेयजल योजना से जोडऩे की ग्रामीण काफी सालों से मांग भी करते आ रहे है, लेकिन इस और किसी ने ध्यान नहीं दिया।
सिंघाड़ों की मिठास दूर-दूर तक
कस्बे में एक तालाब स्थित है। कस्बे के कहार समाज के करीब तेरह परिवार मिलकर सिंघाड़े की खेती करते हैं। बारिश के बाद से ही कस्बे में स्थित तालाब में सिंघाड़े की बेल को डालकर फसल तैयार करते हैं। करीब दस बीघा में सिंघाड़ों की खेती होती है। यहां के सिंघाड़ों में काफी मिठास होती है। इसी विशेषता के कारण सिंघाड़े दूर-दूर तक जाकर बेचे जाते है।