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नई तकनीकी से की गई टमाटर की खेती से हुए वारे-न्यारे

फिल्टर वाटर ड्रिप व मलचिंग के साथ कीट नियंत्रण की नई तकनीकी से की गई टमाटर की खेती ने उपखंड के गंभीरा गांव निवासी पांचूलाल माली के वारे-न्यारे हो गए।

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नई तकनीकी से की गई टमाटर की खेती से हुए वारे-न्यारे

नई तकनीकी से की गई टमाटर की खेती से हुए वारे-न्यारे

नैनवां. फिल्टर वाटर ड्रिप व मलचिंग के साथ कीट नियंत्रण की नई तकनीकी से की गई टमाटर की खेती ने उपखंड के गंभीरा गांव निवासी पांचूलाल माली के वारे-न्यारे हो गए। जिस भूमि पर की जाने वाली फसल से कभी दस हजार रुपए से ज्यादा की आय नहीं हो पाती थी, उस एक बीघा से भी कम भूमि पर हिमशिखर वैरायटी के टमाटरों की रोपी पौध से इतना उत्पादन मिल रहा कि चार माह में ही अब तक डेढ़ लाख रुपए की आय हो चुकी और अभी भी लगातार उत्पादन मिलता जा रहा है। पांचूलाल का पुत्र नेतराम बाहर काम करता था। लॉकडाउन में बाहर काम छोडकऱ अपने गांव चले आने के बाद बेरोजगार हो गया था। चार माह पहले अक्टूबर माह में पिता व पुत्र ने मिलकर अपने कुएं के पास ही एक बीघा से कम भूमि पर टमाटर की हिमशिखर वैरायटी की पौध लगाई तो पौध से अच्छा उत्पादन हुआ। पौध को नुकसान पहुंचाने कोई कीट नहीं पहुंच पाए। इसके लिए पानी से लेकर जैविक खाद तक फिल्टर कर ही दिया जा रहा है। खरपतवार नहीं हो इसके लिए पौधों के चारों ओर मलचिंग बिछा रखी है। मलचिंग के नीचे से ही नलचीनुमा पाइपों के माध्यम से ही ड्रिप सिस्टम से ही जड़ों तक पानी पहुंचाया जाता है। पौधों को कीट नियंत्रण से बचाने के लिए पौधों के बीच ही फैरोमेन ट्रेप व स्ट्रीपी ट्रेप भी लगा रखे हैं। किसान पंंाचूलाल ने बताया कि अक्टूबर माह में टमाटर की पौध लगाई थी। जिससे हुए उत्पादन से अब तक डेढ़ लाख की रुपए की आय हो चुकी।

कृषि अधिकारी ने बताया
सहायक कृषि अधिकारी गणेशकुमार सोनी ने बताया कि हिमशिखर वैरायटी की टमाटर की पौध 6 फीट तक की ऊंचाई तक बेलनुमा(लता) बढ़ता है। पौध को खड़ा रखने के लिए तारों पर ठहराया जाता है। एक पौधे से ही दस से बारह किलो तक उत्पादन मिल जाता है। पौध की एक टहनी पर सौ-सौ ग्राम वजन दस से बारह टमाटर का फलाव
आता है।

किसान के लिए सिस्टम कारगर बन गया
रिलायंस फाउण्डेशन के प्रोजेक्ट मैनेजर मनीष शर्मा ने बताया कि उन्नत सब्जी उत्पादन के लिए फिल्टर वाटर ड्रिप व मलचिंग सिस्टम रिलायंस फाउण्डेशन ने नि:शुल्क उपलब्ध कराया। समय-समय पर इनके बेहतर उपयोग की भी तकनीकी जानकारी दी जाती रही। किसान के लिए यह सिस्टम कारगर बन गया।