
रोजगार के साधन उपलब्ध हो तो रुके पलायन
बड़ाखेड़ा. बूंदी रियासत के बड़े ओहदे का ठिकाना होने से बड़ाखेड़ा की पहचान पुरानी है। कस्बे की स्थापना को लेकर सही जानकारी तो नहीं मिलती, लेकिन नागमाल सिंह हाडा नाम के जागीरदार की वजह से कस्बे को आज भी बुजुर्ग नगजी महाराज का खेड़ा कहते हैं। आजादी के बाद कस्बे का नाम बड़ाखेड़ा पड़ा। राजपरिवार के सदस्य रहे प्रदीप सिंह हाडा ने बताया कि पूर्व ठिकानेदार कर्ण सिंह हाड़ा ने देश आजाद होते ही जगीरदारी की जमीन में से 2700 बीघा जमीन चरागाह के नाम कर दी। जिसका सरकारी आदेश है। वहीं ग्रामीणों के लिए रास्ते के लिए अपनी भूमि दान कर दी। गांव में उस समय ग्रामीणों की आय के स्रोत कृषि, पशुपालन, व्यापार आदि थे। गांव में शहर जैसी सुविधाएं पुराने समय से उपलब्ध है। गांव में आजादी से पहले सरकारी विद्यालय था। गांव में 1972 में पेयजल के लिए बड़ी टंकी का निर्माण हो गया था और घर-घर नल लग गए थे। वर्ष 1970 में बिजली गांव तक पहुंच चुकी थी। 1965 में आयुर्वेद चिकित्सालय खुल चुका था। 1968 में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, ग्रामीण बैंक भी संचालित था।
बाद में लाखेरी कस्बे में स्थानांतरित कर दिया गया। कस्बे में सबसे प्राचीन चारभुजा मंदिर व जानकीराय महाराज का मंदिर है। आजादी से पहले भी गांव में सरकारी कर्मचारी थे और बाद में तहसीलदार बने भीमशंकर शर्मा, भंवर सिंह हाडा, आजादी के कस्बे में सरकारी कर्मचारियों की संख्या तेजी से बढ़ी।
गांव की समस्या
बालिका विद्यालय दसवीं तक नहीं हुआ है। बड़ाखेड़ा से माखीदा रोड तक पक्की सडक़ का निर्माण नहीं हुआ। गांव में आबादी के हिसाब से पुलिस चौकी की स्थापना, गांव में अस्पताल में चिकित्सकों की संख्या कम होना, गांव में स्थाई सफाई कर्मचारी नहीं होने की समस्या है। दीपिका शर्मा ने बताया कि गांव में रोजगार के साधन उपलब्ध हों तो ग्रामीणों का पलायन रुक जाएगा।
Published on:
14 Aug 2021 06:27 pm
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