
जंगली जानवरों से ठिठुरन के बीच फसलों को बचाना मुश्किल हुआ
केशवरायपाटन. सिंचित क्षेत्र के चंबल नदी के किनारे स्थित गांव के किसानों को अपनी फसलें बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। रात में ठिठुरन वाली सर्दी के बीच खेतों पर तंबू लगाकर रखवाली करने के बाद भी जंगली जानवरों से अपनी खेती को नहीं बचा पा रहे हैं।
राज्य सरकार भी किसानों के लिए कोई मदद नहीं कर पा रही है। राष्ट्रीय चंबल घडिय़ाल अभयारण्य क्षेत्र के जंगलों से निकलकर जंगली जानवर जैसे जंगली शूकर, नीलगाय, रोजडे फसलों को रोंदते हुए विचरण करते हैं। इनको रोकने के लिए किसान रात दिन एक कर रहे हैं फिर भी अपनी उपज गंवा रहे हैं। किसानों की मदद के लिए कृषि विभाग भी मदद नहीं कर पा रहा है। सबसे राष्ट्रीय चंबल घडिय़ाल अभयारण्य क्षेत्र घोषित कर वन विभाग ने इसमें जंगली जानवर छोडऩे का काम किया है तब से किसानों के सामने समस्या उत्पन्न हो गई। किसानों को अपनी उपज बचाने के लिए पापड़ बेलने पड़ रहे हैं।
तारबंदी के बाद भी हो रहा नुकसान
चंबल नदी के किनारे स्थित एक दर्जन गांव के किसानों ने अपने खेतों में तार लगा कर झटका करंट लगा रखा है लेकिन फिर भी जंगली जानवर फसलों के दुश्मन बने हुए हैं। यह जंगली जानवर सरसों, गेहूं, चना, मटर की फसलों को बर्बाद कर रहे हैं। सरसों में रात दिन रोजडे भरे रहते हैं। इस समस्या का समाधान नहीं किया गया तो किसानों के सामने खेती करना चुनौतीपूर्ण कार्य होगा।
राष्ट्रीय चंबल घडिय़ाल अभयारण्य सीमा पर सरकार को जंगलों से निकलकर आने वाले जानवरों को जंगल में ही रोकने के प्रबंध करने चाहिए। चम्बल के किनारे ठोस तारबंदी की जाए, ताकि जंगली जानवर खेतों में प्रवेश नहीं कर पाएं। इस समस्या का समाधान जरूरी है, अन्यथा यहां खेती करना मुश्किल हो जाएगा।
हीरा ङ्क्षसह, किसान पादड़ा
चम्बल व मेज नदी के किनारे खेती करने वालों किसानों की समस्या के प्रति राज्य व केन्द्र सरकार गंभीर नहीं है। फसलों को बचाने के लिए रात दिन खेतों में डेरा डालने पड़ते हैं। कृषि विभाग भी मददगार साबित नहीं हो रहा है। लघु सीमांत किसानों के सामने आर्थिक संकट होने से किसान अपने खर्चे पर तारबंदी भी नहीं करवा पा रहे हैं।
राम लक्ष्मण शर्मा, किसान, भीया
Published on:
10 Jan 2023 12:28 pm
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