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बूंदी के पहाड़ों पर आई नई मुसीबत, खरपतवार ने बढ़ाई चिंता

बूंदी जिले के वन एवं पर्वतीय क्षेत्रों में अब विदेशी वनस्पतियों का फैलाव तेजी से हो रहा है, जो अपूर्व चिंता का विषय है। विगत पांच वर्षों में विलायती बबूल, गाजर घास और वन तुलसी सहित आधा दर्जन अन्य विदेशी प्रजातियों की खरपतवार बढ़ी है। इनके बढ़ने से पारंपरिक घास के मैदान खत्म होने लगे हैं, जिससे वन्यजीवह/वें के आश्रय स्थल और भोजन के पारंपरिक स्रोत समाप्त हो रहे हैं।

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Ramgarh Vishdhari Tiger Reserve

गुढ़ानाथावतान. रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व के कालदां बफर जोन के घास के मैदान में फैली वन तुलसी व अन्य खरपतवार।  (पत्रिका फोटो)

गुढ़ानाथावतान. जिले के वन एवं पर्वतीय क्षेत्रों के बारे में अब तक यह मान्यता थी कि यह क्षेत्र काफी हद तक जैविक आक्रमणों से बचे हुए हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में पहाड़ी क्षेत्रों में भी विदेशी वनस्पतियां फैलने लगी है। जानकारी के अनुसार विगत पांच वर्ष में जिले के जंगलों में विलायती बम्बूल, गाजर गास, वन तुलसी के बाद आधा दर्जन अन्य विदेशी प्रजातियों की खरपतवार तेजी से बढ़ी है, जो चिंता का विषय है।

इन अवांछित खरपतवार के बढऩे व तेजी से पहाड़ों पर फैलने से पंरपरागत घास के मैदान खत्म होने लगे हैं। घास के मैदान खत्म होने से वन्यजीवों के आश्रयस्थल व भोजन के परम्परागत स्रोत खत्म होने लगे है। वन विभाग व वन्यजीव विशेषज्ञों से पता चला है कि बूंदी के जंगलों में विदेशी पौधों की प्रजातियां तेजी से इन ऊंचे अनछुए क्षेत्रों में भी फैल रही हैं। गौरतलब है कि हजारों-लाखों वर्षों से जिले की ये ऊंची पर्वत श्रृंखलाएं हजारों वन्यजीवों और पौधों की सैंकड़ों प्रजातियों का घर रहीं हैं। इनमें से कुछ प्रजातियां तो अत्यधिक विशिष्ट हैं, जो शायद कहीं और नहीं पाई जाती।

यह पहाड़ लम्बे समय से इंसानी हस्तक्षेप से भी बचे हुए थे, जिसकी वजह से यह विदेशी पौधों की प्रजातियों के आक्रमण से भी अब तक सुरक्षित रहे हैं। जानकारों के अनुसार विदेशी आक्रामक प्रजातियां न केवल पर्यावरण और जैवविविधता बल्कि कृषि, पर्यटन और स्वास्थ्य के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ा खतरा बन सकती हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि पर्वतीय क्षेत्र जो लम्बे समय से इंसानी हस्तक्षेप से बचे हुए थे, लेकिन बढ़ते तापमान व जलवायु परिवर्तन के दौर में पहाड़ों पर बढ़ती मानवीय गतिविधियां ऐसी प्रजातियों को फैलने का कारण है। पहाड़ों पर बढ़ी खरपतवार का खामियाजा इन क्षेत्रों की मूल प्रजातियों को भुगतना पड़ रहा है। नतीजन जैव विविधता में गिरावट आ रही है। ऐसे में इसपर गंभीरता से सोचने और इन्हें रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

यह सही है कि जिले के कालदां सहित अन्य पहाड़ी इलाकों में नई खरपतवार तेजी से बढ़ी है, जिससे घास के मैदान व अन्य स्थानीय मूल वनस्पतियां गायब होने लगी है। समस्या का अध्ययन कर इसके उन्मूलन के प्रयास करेंगे।
आलोकनाथ गुप्ता, उपवन संरक्षक बूंदी

विलायती बबूल व लेंटाना जैसे विदेशी आक्रांता वृक्षों को हटाया जाता है तो अगले कुछ वर्षों तक विशेष निगरानी एवं उपायों की जरूरत पड़ती है। जंगल में आक्रांता खरपतवार वनस्पतियों की सघन चादर को हटाने पर खाली हुई जमीन पर पहले से भूमि में मौजूद बीज व उसकी जड़ें फिर से पनप जाते हैं। इसके साथ ही ऐसे पहाड़ी क्षेत्रों में जंगली तुलसी, गाजर घास आदि नई खरपतवार तेजी से फैल रही है, जो ङ्क्षचता का विषय है। आवश्यकता इस बात की है कि मुख्य खरपतवार को हटाने के साथ ही नई पनप रही विदेशी प्रजातियों को भी हटाने का लगातार पंचवर्षीय अभियान चलाया जाए।
डॉ सतीश शर्मा, पूर्व वन अधिकारी एवं वनस्पति विशेषज्ञ, उदयपुर।