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कालबेलिया नृत्यांगना पद्मश्री गुलाबो सपेरा बूंदी में बोली : हर घर में गुलाबो हों

वर्ष 2016 में पद्मश्री से सम्मानित किया, अब तक 165 देशों में कला का प्रदर्शन कर चुकी

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कालबेलिया नृत्यांगना पद्मश्री गुलाबो सपेरा बूंदी में बोली : हर घर में गुलाबो हों

कालबेलिया नृत्यांगना पद्मश्री गुलाबो सपेरा बूंदी में बोली : हर घर में गुलाबो हों

नागेश शर्मा : बूंदी. 51 वर्षीय कालबेलिया नृत्यांगना पद्मश्री गुलाबो सपेरा का पुष्कर में मार्च माह तक स्कूल शुरू हो जाएगा, जिसमें कालबेलिया समाज की बेटियां और अन्य नृत्य के साथ -साथ, पारंपरिक पोशाक तैयार करेंगी। इस स्कूल में कालबेलिया समाज की बेटियों के लिए पढ़ाई की व्यवस्था भी होगी। स्कूल की सोच आज अन्य समाजों की बेटियों को आगे बढ़ता देख आई। यह बात गुलाबो ने बूंदी में राजस्थान पत्रिका से बातचीत में कही। उन्होंने कहा कि स्कूल को इंटरनेशनल डांस स्कूल के रूप में तैयार करूं यह भी सपना देखा।

गुलाबो ने कहा कि कालबेलिया नृत्य ने उसे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी। उन्हें भारत सरकार ने वर्ष 2016 में पद्मश्री से सम्मानित किया। वह अब तक 165 देशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी। यूनेस्को ने उन्हें ब्रांड एम्बेसेडर भी बनाया। उन्होंने 7 वर्ष की उम्र में कालबेलिया नृत्य शुरू कर दिया था। 1985 में पहली मर्तबा अमेरिका गई। अब उसकी तीसरी पीढ़ी भी इस क्षेत्र में काम कर रही। पहले बेटी राखी, हेमा व रूपा ने इस कला के प्रदर्शन में साथ दिया। अब पौत्री तीया और माही भी उनके साथ देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी साथ पहुंचकर कालबेलिया नृत्य कर रही। उन्होंने बताया कि 6 वर्षीय पौत्री तीया मंच पर 150 से अधिक राउंड डांस कर चुकी जो अपने आप में इस विधा का रिकॉर्ड होगा। पत्रिका से बातचीत में कहा कि कालबेलिया नृत्य को शुरू किया अब आगे यही सपना होगा कि हर घर में गुलाबो हों। कालबेलिया समाज की बेटियां भी पढ़ लिखकर आगे बढ़ें, उन्हें भी समाज में महत्वपूर्ण स्थान मिले।

दो साल बाद हुई शुरुआत
कोरोना काल ने कलाकारों को रुला दिया था। कोई काम नहीं रहा था। कला के मरने की स्थिति बन गई थी। बीस से अधिक कलाकारों के 200 से अधिक परिवार जनों के भूखे मरने की नौबत आ गई थी। बूंदी से दो वर्ष बाद इसकी शुरुआत हुई, जिसने नई उम्मीद जगा दी।

सरकार ने बढ़ावा दिया
गुलाबो ने कहा प्रदेश सरकार ने इस कला को जीवित रखने में मदद की। भारत सरकार ने 165 देशों में भेजा। पद्मश्री दिया। अब स्कूल बनने से हजारों नृत्यांगनाएं तैयार होंगी। यह डांस जिंदा रहे इसे लेकर हमेशा प्रयास जारी रहेगा।

पढ़ाई नहीं तो ‘आंखें होते हुए भी अंधे’
गुलाबो ने कहा कि वह 165 देशों तक गई, लेकिन शिक्षा का जीवन में बढ़ा महत्व है। यदि शिक्षा नहीं है तो ‘व्यक्ति आंखें होने के बाद भी अंधा है’। इस पीड़ा को झेला और करीबी से देखा है। ऐसे में बेटियां पढ़ें इसके लिए स्कूल का सपना देखा। उन्होंने कहा कि विदेशी बेटियों को भी इस स्कूल में पढ़ाएंगे।