
बूंदी/ नैनवां. कस्बे की बेटियों के लिए सरकार की उच्च शिक्षा की योजना सपना बनकर रह गई है। यहां का महाविद्यालय सरकारी नहीं होने से उच्च शिक्षा के लिए छात्राओं को परेशान होना पड़ रहा है। बेटियां का कहना है कि महाविद्यालय सरकारी होता तो हमारे अभिभावकों को हमें पढ़ाने के लिए प्रथम वर्ष में पांच गुना व द्वितीय व तृतीय वर्ष में आठ गुना ज्यादा फीस नहीं भरनी पड़ती है। नि:शुल्क उच्च शिक्षा योजना सपना बनकर ही रह गई है।
बेटियों का दर्द उनकी जुबानी...
महाविद्यालय में प्रथम वर्ष की परीक्षा दे रही देई की भानुप्रिया वर्मा कहती है कि वह उसकी बड़ी बहन इसी महाविद्यालय में पढ़ रही है। दोनों बहनों की साढ़े 12 हजार फीस जमा करानी पड़ती है। पिता कारीगरी का काम करते है। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने से फीस में इतनी राशि जमा कराना अखरता है। सरकार हमारा कॉलेज सरकारी क्यों नही करती।
रजलावता गांव की प्रथम वर्ष की छात्रा आशा प्रजापत कहती है कि पिता खेती करते हैं। उसकी बहन भी इसी महाविद्यालय में पढऩे आएगी। दोनों बहनों की साढ़े 12 हजार रुपए की राशि जमा करानी पड़ेगी, जो हमारे परिवार के लिए बहुत अधिक है।
कॉेलज सरकारी हो जाता तो इतनी फीस नही देनी पड़ती।
देई की प्रथम वर्ष में पढ़ रही छात्रा अंजली गर्ग कहती है कि कॉलेज सरकारी हो जाता तो हमारे अभिभावकों को इतनी ज्यादा फीस नही देनी पड़ती। सरकार हमारे साथ भेदभाव क्यों कर रही है। या तो कॉलेज को सरकारी करें या फिर सरकारी कॉलेज की जितनी ही फीस ली जाए।
रघुनाथपुरा गांव की प्रथम वर्ष की छात्रा अंतिमा मीणा ने कहा कि महाविद्यालय में ली जा रही फीस बहुत अधिक है। पिता खेती करते हैं। प्रथम वर्ष के लिए 6 हजार 200 रुपए की फीस जमा कराई। अब एक महीने बाद फिर द्वितीय वर्ष के लिए भी इतनी ही फीस जमा करानी पड़ेगी।
बामनगांव की प्रथम वर्ष की छात्रा अनुराधा शर्मा ने कहा कि सरकार बेटियों का दर्द क्यों नही समझ रही। कॉलेज सरकारी हो जाता तो हमें प्रथम वर्ष में चार गुना व द्वितीय व तृतीय वर्ष में आठ गुना फीस नही देनी पड़ती।
मोगदपुरा गांव की प्रथम वर्ष की छात्रा द्वारिका बैरवा ने कहा कि पिता मजदूरी करते है। कॉलेज सरकारी हो जाता तो मामूली फीस भरनी पड़ती। सरकार बेटियों को नि:शुल्क उच्च शिक्षा की बात तो करती है लेकिन हकीकत कुछ और है।
Published on:
10 May 2018 03:00 pm
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