माह-ए-रमज़ान: बरसती आग के बीच मासूमों ने दिया सब्र का इम्तिहान

ख्वाइशों की कोपले अभी इनके मन में नही फूटी शबाब के मायने भी यह नहीं जानते फिर भी एक रूहानियत है जो इनको खुदा की राह पर चला रही है।

By: Suraksha Rajora

Published: 24 May 2018, 02:45 PM IST

बूंदी..ख्वाइशों की कोपले अभी इनके मन में नही फूटी शबाब के मायने भी यह नहीं जानते फिर भी एक रूहानियत है जो इनको खुदा की राह पर चला रही है। इनकी कोई चाह नहीं बस खुदा की रहमत बनी रहें, इतनी सी आरजू है।

 

 

रमजान के महीने में छोटे बच्चे रोजा नहीं रखा करते। इस्लाम
के मुताबिक सात साल से कम उम्र के बच्चे रोजा नहीं रखते लेकिन 48
डिग्री पार तापमान में भी मासूम अनस रज़ा व माहीनूर ने रमजान का पहला रोजा रखा। दोनेा की उम्र महज चार साल है।

 

बरसती आग के बीच बड़े तो खुदा की इबादत में जुटे हुए है ही बच्चे भी पीछे नहीं। रमजान के इस पाक महीने ओर अपने माता-पिता की शिद्दत को देखते हुए इन बच्चों में भी इबादत की जिद सी लगी है। अनस ने कहा कि खुदा उन्हें ताकत देता है। इतना ही नहीं, इस्लाम के सख्त नियमों को मानते हुए उसने अरबी की तिलावत भी पढऩा शुरू कर दिया है।

 

पिता आरिफ ने बताया कि इस्लाम में 5 साल के बच्चों को रोजे रखने की इजाजत नहीं देता, लेकिन बच्चों की जिद और खुदा के प्रति इबादत ने हमे भी बच्चो की जिद के आगे झुका दिया। बस अल्लाह उनसे राजी रहें इसी मकसद से उन्होनें रोजा रखा।

 

मासूम बच्चों ने जब रमजान को लेकर उनसे बता की तो उनका कहना था कि अल्लाह का वादा है कि जिसने उसके हुकूम के मुताबिक जिन्दगी बिताई तो उसे जन्नत देने का वादा किया है। दो जख की आग में जलेगा। दो जख की आग में जलने से बेहतर है भरी गर्मी से झुलस कर रोजा रख लेना।

 

उनका एक ही मकसद है, बस अल्लहा राजी हो जाए। मंजिल पर पहुंचना तब आसान हो जाता है जब राह सीधी हो। मजहबे इस्लाम में रोजा रहमत और राहत का रहबर, पथ प्रदर्शक है।अल्लाह की रहमत होती है तभी दिल को सुकून मिलता है।

Suraksha Rajora
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