
केशवरायपाटन. सहकारी चीनी मिल कार्यालय।
केशवरायपाटन. राज्य सरकार की ओर से प्रदेश की एक मात्र सहकारिता पर आधारित चीनी मिल को पीपीपी मोड पर देने की घोषणा के बाद विभाग ने सहकारी चीनी मिल के अंशधारियों से अपनी हिस्सा राशि प्राप्त करने के लिए नोटिस चस्पा किया है, लेकिन अंशधारी कृषक फिर भी अपनी हिस्सा राशि लेने नहीं पहुंच रहे हैं। मिल के 430 से अधिक अंशधारी कृषक है, लेकिन अब तक मात्र 131 कृषकों ने ही अपनी हिस्सेदारी राशि प्राप्त की है। मिल को वर्ष 2000 में बंद करने के बाद हिस्सा राशि प्राप्त करने के लिए यह तीसरा प्रयास है। मिल बंद होने के बाद वर्ष 18 फरवरी 2012 व 20 नवम्बर 2012 को हिस्सा राशि लेने की सूचना जारी की गई थी। किसानों ने अपना पसीना बहा कर वर्ष 1977-78 में मिल की स्थापना की थी।
शुरुआत में 250 रुपया का एक शेयर खरीदा गया। इसके बाद 500 रुपए का शेयर दिया गया। मिल शुरुआत में काफी सफल रही। 22 साल के लम्बे उतार चढ़ाव के बाद मिल को घाटे का उपक्रम घोषित कर दिया। वर्ष 1999 में प्रदेश में अकाल पडऩे पर कांग्रेस शासनकाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वर्ष 2000 के गन्ना पिराई सीजन के बाद बंद कर दिया। मिल में 2003 में अवसायक नियुक्त किया गया।
ठगा महसूस कर रहे किसान
क्षेत्र के किसानों ने अपनी बहुमूल्य 636 बीघा कृषि भूमि सहकारी चीनी मिल को देते समय गर्व हुआ करता था। अपनी सीमित आमदनी में से भी मिल को ङ्क्षजदा रखने के लिए अपने सामथ्र्य के अनुसार शेयर खरीदे। किसानों ने सोचा था की शेयर खरीदने के बाद मिल में अपनी भागीदारी होगी, लेकिन अब मूल हिस्सेदारी लेनी पड़ रही है, जिनके पास 250 रुपए के शेयर है तो उसको वहीं राशि थमाई जा रही है। सरकार ने मिल की भूमि में से देनदारियां चुकाने के नाम पर 458 बीघा भूमि जयपुर विद्युत प्रसारण निगम को मोटे दामों पर बेच दी। मिल के पास अब 116 बीघा भूमि बची, जिसमें 20 बीघा भूमि पर अतिक्रमण कर रखा है। मिल के पास तो मात्र 96 बीघा ही भूमि हाथ लगी, जिसमें भी जंगल उगा हुआ है। प्रशासन मिल की भूमि का सीमा ज्ञान करवाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
अभी भी देनदारियां
सहकारी चीनी मिल पर अभी भी देनदारियां है। मिल सूत्रों ने बताया कि मिल की भूमि बेचने के बाद बची राशि की एफडी करवा दी थी। अब मिल के पास 59 करोड़ रुपए की एफडी है, लेकिन अभी राज्य की विभिन्न एजेंसियों का ब्याज व केन्द्र सरकार का कर्ज देना है।
करोड़ों की सम्पत्ति बनी कबाड़
सहकारी चीनी मिल को जब बंद किया गया था, वह करोड़ों की सम्पत्ति का मालिक थी। बंद होने के बाद मिल व उसकी बहुमूल्य इमारतों को भगवान भरोसे छोड़ दिया। सुशोभित विश्राम गृह, मिल प्रबंधक का आलीशान आवास, कर्मचारियों के आवास अब जर्जर हो चुके हैं। वह अपनी बर्बादी के आंसू बहा रहे हैं। मिल की मशीनें जंग लगने से अनुपयोगी हो गई है। मिल के 50 प्रतिशत सामान चोरी चले गए हैं। सरकार ने मिल को बंद कर अपनी आंखें मूंद ली।
बजट घोषणा में पीपीपी मोड पर चलाने की घोषणा की गई थी। अंशधारी रूचि नहीं दिखा रहे है। तीन बार नोटिस जारी किए गए है।
मुकेश मोहन गर्ग, कार्यवाहक उप सहायक रजिस्ट्रार सहकारी समितियां बूंदी
Published on:
06 May 2026 11:50 am
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