7 अप्रैल 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

कागजों के भरोसे चल रहा यातायात- सडक़ पर कैसी सुरक्षा- न सिग्नल न ही जेब्रा क्रॉसिंग, व्यवस्थित यातायात के लिए मैप तक नही..

शहर में यातायात संसाधन बढ़ाने या जुटाने की बजाय जुगाड का तरीका अपनाया जा रहा है।

3 min read
Google source verification
sadaq par kaisee suraksha-signal no zebra crossing Mapsystemat traffic

बूंदी. शहर में यातायात संसाधन बढ़ाने या जुटाने की बजाय जुगाड का तरीका अपनाया जा रहा है। आपातकाल में उपयोग में आने वाली क्रेन भी नही है। मौका पडऩे पर हाथ खड़े कर दिए जाते है। जवाबदारों की अनदेखी का आलम यह है कि शहर में एक भी स्थान पर सिग्रल नही है। जबकि जेब्रा कॉ्रसिंग जैसे मैप को तो भुला ही दिया गया है।

Read More: तलवारों के भी निकल जाते आंसू , जन्मदाता का दु:ख देखकर...जो कल तक करते थे जंग जूं तैयार आज उनकी पीढिय़ा हो रही बैकार...

इसे लापरवाही कहे या प्रशासन की सुस्त कार्यप्रणाली की बूंदी में आज तक यातायात व्यवस्था पटरी पर नही आ पाई है। शहर में अनेक यातायात दबाव वाले रोड़ पर न सिग्नल है न जेब्रा कॉ्रसिंग बनाई गई जिससे राहगीर व वाहन चालक एक साथ चलते है। बेतरतीब यातायात व्यवस्था के चलते आए दिन हादसों में भी इजाफा हो रहा है।

Read More: यहां नानी बाई कर रही कृष्णा का इंतजार...कौन भरेगा परिषद के खाली खजाने को...

ऑटो और मझले वाहन चालकों की मनमानी भी परेशानी बनी है। ऑटो और मझले वाहन खड़े करने की जगह नही है। बावजुद इसके ऑटो सावारी बिठाने के लिए मनमानी जगहों पर खड़े हो जाते है। सबसे ज्यादा परेशानी बस स्टेंड से बाहर निकलते ही खड़ी होती है।

Read More: राजस्थान में शादी का अनोखा कार्ड,श्लोक नही, छपवाए मोदी मिशन के नारे

डेढ़ लाख से भी ज्यादा आबादी वाले शहर में यातायात विभाग भी कम जवानों से ही काम ले रहा है। शहर के कई पांईट तो दिनभर खाली ही रह जाते है। वहीं दबाव वाले पाइंटों पर भी कम जवानों की संख्या के चलते अव्यवस्था को दूर नही किया जा रहा।


सबसे ज्यादा परेशानी-


शहर में सबसे ज्यादा परेशानी अस्पताल के बाहर बनती है, जब मरीजो को आने जाने में भी परेशानी उठानी पड़ती है। बस स्टेंड के सामने ही लोक परिवहन बसों का जमावड़ा ऑटो-टैम्पों बेतरतबी तरीके से खडे होते है। हाल ही में गर्भवती महिला को इन समस्याओं से दो चार भी होना पड़ा। मीरा गेट, इन्द्रा मार्केट, नैनवा रोड़ सहित कई चौराहों पर निकलना जौखिम से कम नही शहर के बाजार का तो यह आलम है कि वाहन खड़े करने तक में जगह तलाशनी पड़ती है। बूंदी की स्थापना के बाद से ही रोड़ तो वही है लेकिन यातायात दबाव समय के साथ बढ़ता जा रहा है। हर साल 1200 से अधिक वाहन निकल रहे हैैै,इसके अलावा चार पहिया वाहन, लौडिग़ वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही है।

इन कायदों पर ध्यान नहीं-


चौराहों पर जेब्रा क्रॉसिंग, हर चौराहे पर सिग्नल की व्यवस्था हो-
प्रमुख रोड़ अतिक्रमण युक्त बनाएं-
वन-वे व्यवस्था के जरिए दबाव कम हो।
ओवर लोड ऑटो-टैम्पो पर नकेल कसे।
गलत दिशा में वाहन चलाने वालों पर कार्रवाई हो।
सरकारी वाहनों के लिए रूट तय किए जाए-

प्रशासन की भी पहल नही-
प्रशासनिक बैठक में सुझााव कम आपत्तियां ज्यादा, अतिक्रमण के चलते परिवहन व्यवस्था में बदलाव नही।

यातायात विभाग की मुसीबत-
यातायात विभाग के पास खुद की आधुनिक क्रेन तक नही।
घनी आबादी में वाहन पार्क एरिया तय नही।
यातायात जवानों को सीधे कार्रवाई अधिकार नही-
नियमों को दरकिनार करने के मामलों में बढोत्तरी।


अभी यह परेशानी-


मानदाता छतरी मामले में विभाग अब माहौल सुधरने की बाट जौह रहा है। फिलहाल गुरुद्वारा से मीरा गेट आने के लिए बंद कर रखा है उसके लिए कागजी देवरा होकर चौमुखा होकर रास्ता निकाल रखा है। वहीं दबलाना जाने के लिए फुलसागर होकर जा सकते है। बेरिकेट्स लगने से आवाजाही में परेशानी बनी हुई है।


सिग्नल सरकार लगाए सिग्नल-


शहर की यातायात व्यवस्था को सुचारू करने के प्रयास किए जाएगें। फिलहाल मानदाता छतरी विवाद के बाद विभाग इसी में जुटा है। शहर के चौराहों पर सिग्नल को लेकर सरकार को कलक्टर के माध्यम से लिखकर दे रखा रखा है। कोटा मार्केट एक खंभे की छतरी, कंट्रोल रूम के सामने, श्रीराम मेंडिकल, सर्किट हाउस, बस स्टेंड पर प्रमुख रूप से सिग्नल लगाए जाने की दरकार है। यहां ट्रेफिक का दबाव बहुत ज्यादा है।
मोबिन खान यातायात प्रभारी