5 अप्रैल 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

मूर्तिकला उद्योग ने बनाई बड़ानयागांव की पहचान

आधुनिकता की भी दिख रही झलक

2 min read
Google source verification
मूर्तिकला उद्योग ने बनाई बड़ानयागांव की पहचान

मूर्तिकला उद्योग ने बनाई बड़ानयागांव की पहचान

बड़ानयागांव. सब्जियों की पैदावार के लिए प्रसिद्ध बड़ानयागांव ने मूर्तिकला उद्योग में भी अपनी छाप छोड़कर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश में भी अपनी पहचान स्थापित कर ली है। यहां राष्ट्रीय राजमार्ग 52 किनारे स्थित बड़ानयागांव के मूर्तिकला कामगारों की इस कला को देखकर यहां से गुजरने वाले राहगीरों के कदम भी यहां ठहरने पर मजबूर हो जाते हैं। यहां के मूर्ति कलाकार बेजुबान पत्थर को तराशकर उसमें जान डाल रहे हैं। मूर्ति कलाकार हजारीलाल कुमावत बताते हैं कि यहां चार दशक पूर्व दो स्थानों पर मूर्तिकला निर्माण का काम किया जाता था, जो अब धीरे-धीरे बढ़कर यहां दो दर्जन स्थानों पर मूर्तिकला उद्योग का काम किया जा रहा है। शुरुआती दौर में मूर्तिकला का सारा काम हाथों से किया जाता था, लेकिन अब समय के साथ मूर्तिकला में आधुनिक मशीनों का सहारा मिलने से कलाकारों का काम आसान हो गया है। यहां के मूर्तिकला उद्योगों में लाल सफेद पत्थर मकराना में देवी देवताओं पशुओं महापुरुषों आदि की सुंदर मूर्तियों का निर्माण किया जाता है। मूर्तिकला के साथ-साथ यहां के कलाकार अब आधुनिक मंदिरों व द्वार के निर्माण कार्य में भी आगे आ रहे हैं। कलाकार मंदिरों के निर्माण में पत्थरों को तराश कर छतरियां, पिलर, शिखर, झालर, घूमर, गुंबद आदि तैयार कर रहे हैं। यहां मूर्तिकला उद्योगों में निर्माण के लिए पत्थर दौसा, धौलपुर, करौली, बयाना, भरतपुर, जोधपुर आदि जगह से लाया जाता है।
कोरोना ने तोड़ी मूर्तिकला उद्योग की कमर
कोरोना काल ने यहां के मूर्तिकला उद्योग की कमर तोड़ के रख दी है। कोरोना काल में उद्योगों पर कई दिनों तक कार्य बंद होने से क्षेत्र के कई मूर्तिकला कामगारों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ा। वर्तमान समय में उद्योगों पर काम चल रहा है, लेकिन अभी तक पूरी तरह से कार्य पटरी पर नहीं आ पाया है। मूर्तिकला उद्योग संचालक भगवान कुमावत, गिर्राज कुमावत, नरेश कुमावत ने बताया कि मजदूरों के अभाव में बाहर से पत्थर काफी कम आ रहा है। निर्माण का कार्य भी काफी धीमा होने से यहां उद्योग पर तैयार की गई मूर्तियां व अन्य उत्पाद नहीं जा पा रहे हैं। जिसके चलते उद्योग पर संकट आ गया है। यहां काम कम होने से कई कामगारों का रोजगार छिन गया।
सिलिकोसिस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं कामगार
यहां मूर्तिकला उद्योगों में कार्य करने वाले कामगार सिलिकोसिस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। पिछले सालों में क्षेत्र के आधा दर्जन मूर्ति कलाकार बीमारी से पीडि़त होकर दम तोड़ चुके हैं तथा कई अभी बीमारी से संघर्ष कर रहे है, लेकिन इसके बावजूद भी सरकार की ओर से मूर्तिकला संरक्षण के लिए कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। मूर्ति कलाकार गोपाल सैनी, तेजमल कुमावत, मुकेश बैरवा, चेतराम सैनी ने बताया कि सिलिकोसिस बीमारी का दंश झेलने के बाद भी मूर्तिकला को जीवित रखने के लिए यहां उद्योगों पर कार्य कर रहे हैं, लेकिन सरकार की ओर से किसी प्रकार का सहयोग नहीं मिलने से परेशानियों से जूझना पड़ता है। कोरोना काल में काम बंद होने के चलते बेरोजगारी का सामना करना पड़ा, लेकिन सरकार की ओर से सहयोग नहीं मिलने से परेशानी जीवन यापन करना पड़ रहा है।