
नैनवां. दहेलवालजी मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए तैयार किया मंच।
नैनवां. लोक संस्कृति व कला की पहचान हाथों में गोदना व तो दांतों में चौंप लगवाती देहाती बालाएं, बाजूबंध की झूमा, बूंदी की फूंदी खरीदती महिलाएं, तो अलगोजों की धुन पर हाथ में छतरिया लेकर नृत्य करते ग्रामीण। एक दशक से लोक संस्कृति के यह नजारें लुप्त हो गए। तब से ही लोक संस्कृति व कला की पहचान वाले एक पखवाड़े तक चलने वाले नैनवां के दहेलवालजी मेले का स्वरूप ही बदल गया। मेले में अब न कोई गोदनें वाले आ रहे है और न ही चौंप लगाने वाले न बूंदी की फूंदी बेचने वालों की दुकाने लगती है तो न अलगोजों के संग नृत्य करने वाले ग्रामीण पहुंचते है।
मेला स्थल पर तीज के चबूतरे, धाकड़ों की धर्मशाला, धापड़धींगों की धर्मशाला की छतों पर ग्रामीणों की टोलियां दस-दस घंटों तक अलगोजों पर नृत्य करती रहती थी। जब मेले में बूंदी की फूंदी बेचने वालों का अलग ही बाजार सजता था। कभी मेले में बूटीदार लहंगों व पोमचे की ओढनी की मांग भी इतनी होती थी इनका भी अलग बाजार लगा करता था। हलवाइयों की दुकानों पर रस भरी जलेबी खाने वाले भी नहीं आते तो कलाकंद बेचने वाले भी मेले से नदारद है। मेले से इन नजारों के लुप्त होने से मेला सिर्फ बाजार का रूप बनकर रह गया है।
गोदनों की जगह टेटू ने ले ली है तो काठ के खिलौनों की जगह प्लास्टिक के खिलौनों ने। न गाडिया बिकने आते है और न ही तांगे। न किवाड़ों की मांग रही और न ही बारसोत की। मेले में इनका भी अलग बाजार सजता था। जिले से ही नहीं, टोंक, अजमेर, सवाईमाधोपुर, भीलवाड़ा से बड़ी संख्या में लोग मेले में खरीद करने आते थे।
Published on:
16 Sept 2025 06:04 pm
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