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कभी बंजर थी भूमि, अब यहां दिखता है ढाई हजार पेड़ का झुरमुट

वृक्ष प्रेमी संत का पर्यावरण प्रेम

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कभी बंजर थी भूमि, अब यहां दिखता है ढाई हजार पेड़ का झुरमुट

कभी बंजर थी भूमि, अब यहां दिखता है ढाई हजार पेड़ का झुरमुट

नैनवां. कस्बे के नजदीक बटवाडिय़ा की टेक पर जिस बंजड़ भूमि पर पहले जूलीफ्लोरा (बिलायती बबूलों) का जंगल उगा पड़ा था, वहां पर 74 वर्षीय संत रामदास ने साढ़े चार बीघा बंजड़ भूमि को बाग बना दिया। भूमि पर अब बीस से अधिक प्रजाति के पौधे वृक्षों का रूप लेते जा रहे हैं। एक ओर जहां सरकारी माध्यम लाखों रूपए की राशि खर्च कर लगाये जाने वाले पौधे पनपा नहीं पाता, वहीं रामदास ने इस उम्र में भी बिना किसी सरकारी सहायता के अपने श्रम से छायादार व फलदार ढाई हजार पौधों का बाग खड़ा कर दिया। जिनमें आधे से ज्यादा पौधे वृक्षों का रूप ले चुके हैं। पौधारोपण कर सरसब्ज किए इस स्थान को लोग अब बटवाडिय़ा का बाग के नाम से जानने लगे हैं। बाग में ही अपनी कुटिया बना रखी है। संत के पास पांच सौ रुपए की मासिक सामाजिक सुरक्षा पेंशन व खाद्य सुरक्षा से मिल रहा गेहूं ही आय है। पौधों के लिए गोबर की देेशी खाद की व्यवस्था के लिए सात गायें पाल रखी है। जिनके दूध से होने वाली आय से ही पौधारोपण पर ही खर्च कर देते है। हर वर्ष अपने पैसों से ही पौधें खरीद कर लाते रहे और स्थान को बाग का रूप देते रहे। रामदास का वृक्षों से ऐसा प्रेम है कि सूर्यादय से सूर्यास्त तक उनकी निराई व गुडाई के साथ पानी व खाद देने में ही जुटे रहते है। गायों के लिए बाग में ही एक कोने पर चारा भी उगा रखा है।

धमकियों से नहीं डरे, अपने मिशन में लगे रहे
न कोई सरकारी सहायता मांगी और न ही किसी के आगे हाथ फैलाया। हाथ में कुल्हाड़ी लेकर पहले बिलायती बबूलों को साफ किया उसके बाद पौधारोपण अभियान में जुट गए। स्थान कस्बे के नजदीक व राज्य राजमार्ग पर होने से कई लोगों की यहां पर कब्जा करने की नीयत थी। पौधारोपण करने की शुरुआत की तो कई लोगों के विरोध का सामना भी करना पड़ा था। धमकियां भी मिली, लेकिन धमकियों से डरे नहीं और अपने मिशन में लगे रहे। दिन में पौधे लगाए जाते तो धमकाने वाले रात में पौधों को उखाड़ जाते। सुरक्षा करने के लिए यहीं पर अपनी कुटिया बनाकर रहने लगे। पौधों की सुरक्ष के लिए रात-रात भी जागना भी पड़ा।

पेड़-पौधे ही मेरा परिवार
संत रामदास ने कहा कि वृक्ष बनते पौधों को देखता हू तो बहुत सुकून मिलता है। मेरा कोई परिवार नहीं है। पेड़ बनते पौधे ही मेरा परिवार व मित्र है। अब कितना सा जीवन बचा है। संसार छोडऩे के बाद अपने किए की यही निशानी तो जिंदा रहती है। इस वर्ष भी पचास से अधिक पौधे रोपे हैं। पौधे बढ़ते हैं तो समझता हूं कि परिवार बढ़ रहा है।