
Archana's record win after 15 years, Manju created history in NEPA
बुरहानपुर. विधानसभा चुनाव के परिणामों ने सभी को चौंका दिया। हार जीत का करीबी मुकाबले का गणित सभी के फेल हो गए। भाजपा पर लोगों ने खूब प्यार लुटाकर रिकॉर्ड जीत दिला दी। भाजपा की उम्मीदवार अर्चना चिटनीस ने 31081 मत से जीत दर्ज की ये 2008 के बाद चिटनीस की सबसे बड़ी जीत है। वहीं नेपानगर में भाजपा की मंजू दादू ने इतिहास रच दिया। 2015 के उपचुनाव में दादू ने खुद का रिकॉर्ड तोड़ा तब वह 42401 वोट से जीती थी, इस बार वह 44805 मतों से चुनाव जीती। परिणाम के बाद जश्न का माहौल हो गया। शहर में अतिशबाजी कर खूब मिठाइयां बटी।
रविवार को शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र में मतों की गिनती की गई। दोपहर तक ही विधानसभा चुनाव के परिणाम ने पूरी तस्वीर साफ कर दी। नेपानगर में भाजपा की मंजू दादू ने रिकॉर्ड मतों से जीत हांसिल कर वापसी की तो विधानसभा से भाजपा की उम्मीदवार पूर्व मंत्री अर्चना चिटनीस ने कांग्रेस से उम्मीदवार विधायक सुरेंद्रसिंह को हराकर वापस सीट पर कब्जा कर लिया। पिछली बार चिटनीस को यहां से 5 हजार मतों से हार मिली थी।
5 साल फिर चिटनीस और मंजू की वापसी
2018 के चुनाव में भी बुरहानपुर से भाजपा की उम्मीदवार अर्चना चिटनीस और नेपा से मंजू दादू को बनाया गया था। तब अर्चना निर्दलीय उम्मीदवार सुरेंद्रङ्क्षसह शेरा से 5120 मत से हारी थी और मंजू दादू कांग्रेस की प्रत्याशी सुमित्रा कास्डेकर से 1264 मतों से हारी थीं। 2023 के चुनाव में दोनों ने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज कर वापसी कर ली।
भाजपा के जीत के ये पांच फेक्टर
2018 के चुनाव में अर्चना चिटनीस हारने के बाद भी लगातार जनता के संपर्क में रही विकास कार्य को लेकर सक्रिय भूमिका में दिखी।
चिटनीस का खुद का लंबे समय से चुनाव लडऩे का अनुभव काम आया। जहां वोट बैंक वहां के बूथ लेवल के कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया।
इस बार ज्यादा स्टार प्रचार नेता नहीं आए, खुद ने और सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल ने मोर्चा संभाला।
महिलाओं के बीच सरकारी योजनाएं और खासकर लाडली बहनों को खूब भुनाया।
कमजोर क्षेत्र जहां नुकसानी का भय था, वहां विशेषकर मोर्चाबंदी की लगातार कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया।
कांग्रेस के हार के ये पांच फेक्टर
कांग्रेस सुरेंद्र सिंह पर एंटी इनकमबेंसी हावी रही। रूठों को मनाने में सफल नहीं हो सके।
कांग्रेस के अल्पसंख्यक नेता टिकट न मिलने से नाराज हुए उनकी नाराजगी भारी पड़ गई
कांग्रेस से टिकट न मिलने से नाराज नफीस मंशा खान ने एआईएमआईएम का दामन था उन्हें अल्पसंख्यक नेताओं ने खुलकर समर्थन किया।
कमलनाथ की जनता के हित की योजनाओं को भुनाने की बजाय वे पूरे चुनाव कैंपन में गुटबाजी से ही जूझते दिखे।
2018 का चुनाव जीतने के बाद सुरेंद्रसिंह के विकास कार्य न करने की नाराजगी भी लोगों की भारी पड़ गई।
नहीं चला हर्षवर्धन का जादू
इस बार के चुनाव में सबसे चर्चित उम्मीदवार दिवंगत सांसद नंदकुमारसिंह चौहान के बेेटे हर्षवर्धनसिंह चौहान रहे। पार्टी से बगावत कर वे निर्दलीय मैदान में उतरे। पार्टी के कई पदाधिकारियों ने खुलकर उनका समर्थन किया और पार्टी ने सभी को निष्कासन भी किया। हर्षवर्धन का माहौल भी खूब जमा। लेकिन उनका जादू लोगों के मतों पर असर नहीं किया। महज 30 हजार वोटों तक वे सिमट गए।
बुरहानपुर में अब तक सबसे बड़ी जीत
2008 में अर्चना चिटनीस ने कांग्रेस के हमीद काजी को 32854 वोट से हराया।
2013 में अर्चना चिटनीस ने कांग्रेस के अजय रघुवंशी को 22827 वोट से हराया।
2023 में अर्चना चिटनीस ने कांग्रेस के सुरेंद्रसिंह को 31081 वोट से हराया।
बुरहानपुर में कम अंतर से हारे
1957 में कांग्रेस के अब्दुल कादर सिद्दिकी ने फकीरचंद नानकलाल को 440 वोट से हराया।
1967 में परमानंद गोविंदजीवाला ने मो. हारुन को 1461 मत से हराया।
2018 में निर्दलीय सुरेंद्रसिंह ने भाजपा की अर्चना चिटनीस को 5120 वोट से हराया।
24 साल से कांग्रेस बुरहानपुर में नहीं आईं
बुरहानपुर में कांग्रेस विधानसभा चुनाव में 24 साल से जीत नहीं पाई है। 1999 में कांग्रेस की उम्मीदवार मंजूश्री ठाकुर ने 26295 वोट से निर्दलीय उम्मीदवार अब्दुल रब को हराया था। इसके बाद फिर कांग्रेस की वापसी नहीं हुई। 2003 में एनसीपी से हमीद काजी जीते। 2008 में भाजपा की अर्चना, 2013 में फिर भाजपा की अर्चना और 2018 में निर्दलीय सुरेंद्रसिंह ने जीत दर्ज की।
बुरहानपुर
प्रत्याशी कुल वोट मिले
अर्चना चिटनीस, भाजपा 99998
ठाकुर सुरेंद्रसिंह 68917
हर्षवर्धनसिंह चौहान, निर्दलीय 35283
नफीस मंशा खान 33680
सुनील नायके 1372
उमर मैकेनिक 516
दत्तु मेढ़े 841
धु्रवराज तायड़े 324
वामनराव ससाणे 483
कैलाश वाघे 252
भिका पासी 249
भूषण पाठक 546
मोहम्मद हनीफ 748
नोटा 2579
कुल विधिमान्य मत 243209
कुल वोट 245788
Published on:
04 Dec 2023 12:27 pm
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