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बुरहानपुर में पहली बार : सुंदर मी होणार के मंचन में दिखाया जीवन जीने के गुर

- कविवर्य भास्कर रामचंद्र तांबे की स्मृति में दिए पुरस्कार- पहली बार बुरहानपुर में हुआ आयोजन

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 सुंदर मी होणार के मंचन में दिखाया जीवन जीने के गुर

सुंदर मी होणार के मंचन में दिखाया जीवन जीने के गुर

बुरहानपुर. मराठी भाषा में नाटक का मंचन, रंग बिरंगी लाइटिंग के बीच 10 कलाकारों ने 20 घंटे 10 मिनट की अवधि में तीन गानों के साथ अपने अभिनय के जरिए सभी को जीवन जीने के गुर बता गए। अवसर था इंदिरा कॉलोनी स्थित परमानंद गोविंदजीवाला ऑडिटोरियम में मराठी नाटक सुंदर मी होणार का।
मराी साहित्य अकादमी की निदेशक पूर्णिमा हुंडीवाला ने बताया कि शब्दमैत्री मराठी साहित्य मंडल बुरहानपुर की ओर से यह आयोजन मराठी साहित्य अकादमी के तत्वावधान में किया। जहां पहले भास्कर रामचंद्र तांबे पुरस्कार वर्ष 2014.15 के लिए इंदौर के श्रीनिवास हवलदार को उनकी कृति ग्रेसच्या कविता तथा जबलपुर के डॉ. महारूद्र वैद्य को मेरा चिकित्सक प्रवास कृति के लिए सम्मानित किया गया। अतिथियों ने शॉल.श्रीफल प्रशस्ति व 51-51 हजार रुपए का चेक प्रदान किया। मध्यप्रदेश के ग्वालियर में जन्में कविवर्य भास्कर रामचंद्र तांबे की स्मृति में मराठी साहित्य अकादमी, मप्र संस्कृति परिषद् भोपाल द्वारा मराठी कहानी, कविता, कादंबरी, उपन्यास एवं नाट्य पर लिखी गई श्रेष्ठ कृतियों का चयनित कर यह पुरस्कार प्रतिवर्ष दिया जाता है। इसमें विधायक सुरेंद्रसिंह, महापौर अनिल भोसले, आशीष गुजराती, सुशीला तरस सहित अन्य गणमान्य नागरिकगण उपस्थित रहे। अकादमी की पत्रिका अथर्वनाद के चौदहवें अंक व जयंत भालेराव की पुस्तक सूर्योदय संगम का प्रकाशन भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन विद्या श्रॉफ एवं अनुराधा मजुमदार ने किया। हुंडीवाला ने बताया कि पहली बार बुरहानपुर में यह आयोजन हुआ।
नाटक में खूब बजी तालियां
मराठी नाटक सुंदर मी होणार का मंचन में खूब तालियां बजी। मराठी के प्रसिद्ध नाटककार पुल देशपांडे व डॉ. यादवराय गावले द्वारा निर्देशित नाटक भी हुआ। नाटक के जरिए सुंदर जीवन जीने की कल्पना रखने वाली एक दिव्यांग लड़की की कहानी को दिखाया। नाटक की कहानी स्वतंत्र भारत की है। जब नंदनवाड़ी संस्थान का भारतीय लोकतंत्र में विलय किया गया।
संस्थान के महाराज निराश हैं और मानसिक पीड़ा से गुजर रहे हैं। वे चारों संतानों को महल से बाहर जाने के लिए मना करते हैं। इनमें सबसे बड़ी बेटी, बीमारी की वजह से अपाहिज हो गई है और महल में एक कमरे में ही जीवन गुजारती है। वह कविताओं से सबको जीवन जीने की कला सिखाती है। बड़ी बहन की कविताओं से प्रेरित होकर सभी भाई.बहन महल से बाहर जाने के लिए संघर्ष करते हैं। आधुनिक कवि के संपर्क में आकर बड़ी बहन के जीवन में चैतन्य आता है और वह चलने लगती है। उधर महल की घुटन को, बंधनों को तोडऩे में सबसे छोटी बहन बेबी कामयाब हो जाती है।