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RBI के चौंकाने वाले आंकड़े: 47 साल के निचले स्तर पर पहुंची भारतीयों की बचत, खर्च में भारी उछाल

RBI के ताजा आंकड़ों के अनुसार भारतीय घरेलू बचत 47 साल के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है। जानिए क्यों युवा पीढ़ी 'बचत' छोड़ 'कर्ज और खर्च' को प्राथमिकता दे रही है और इसका देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा। पढ़ें विशेष विश्लेषण और सर्वे रिपोर्ट।

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Indian Economy Trends

बदलता दौर: कमाओ और खर्च करो की फिलॉसफी अपना रहे युवा, भविष्य के सुरक्षा कवच के बजाय वर्तमान की सुख-सुविधाओं पर दांव। (Photo Credit - ANI)

India Household Savings: वैश्विक महामारी के बाद की दुनिया का आर्थिक पैटर्न तेजी से बदल रहा है और इसका सबसे बड़ा असर घरेलू बचत पर पड़ा है। भारत सहित पूरी दुनिया में घरेलू बचत दरें ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गई हैं, जबकि उपभोग और खर्च की प्रवृत्ति में बड़ा उछाल आया है। भारतीय संस्कृति में सदियों से 'पाई-पाई जोड़कर' भविष्य संवारने की भारतीय परंपरा अब आधुनिकता और बाजार की चकाचौंध के बीच पीछे छूट रही है। अब तो यह निचले स्तर पर आ गई।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों पर गौर करें तो वित्त वर्ष 2023-24 में देश में शुद्ध घरेलू वित्तीय बचत गिरकर जीडीपी के 5.3 फीसदी पर आ गई, जो पिछले 47 वर्ष में सबसे कम है। इसी तरह यदि भारत की कुल सकल बचत देखें तो 2015 में 32.2 फीसदी थी, जो 2024 में घटकर 30.7 रह गई।

दरअसल ये सब युवा पीढ़ी की सोच में आए बदलाव का ही नतीजा है। पहले आय कम थी, लेकिन बचत ज्यादा थी, जबकि आज आय ज्यादा होने के बावजूद बचत घटी है। पुरानी पीढ़ी बचत को जीवन की प्राथमिकता मानती थी, वहीं युवा 'वर्तमान में जीने' की फिलॉसफी अपनाकर सेवाओं और अनुभवों पर खर्च कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बचत की कमी से भविष्य की वित्तीय सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, लेकिन अल्पकालिक विकास में यह अच्छा है। यानी राष्ट्रीय अर्थनीति के लिहाज से यह बदलाव उत्साहजनक भी है।

पीढिंयों की सोच बदली: पहले ‘सुरक्षा कवच’ था, अब ‘कमाओ और खर्च करो’

पुरानी और नई पीढ़ी के बीच बचत को लेकर एक स्पष्ट वैचारिक विभाजन दिखाई देता है। पुरानी पीढ़ी (बेबी बूमर्स और जेन एक्स) के लिए बचत एक ‘सुरक्षा कवच’ थी। पैसा बचाना नैतिक जिम्मेदारी मानी जाती थी। निवेश का अर्थ सिर्फ एफडी और सोना होता था। अब नई पीढ़ी (मिलेनियल्स और जेन जी ) की ‘कमाओ और खर्च करो’ की धारणा ने बचत की प्राथमिकता को पीछे धकेल दिया। अब युवा रिटायरमेंट के लिए फंड जुटाने से ज्यादा वेकेशन, गैजेट्स और लाइफस्टाइल सेवाओं को दे रहे हैं।

वर्तमान के लिए भविष्य की आय पर दांव

पहले वर्तमान की आय से भविष्य के लिए बचाया जाता था, वहीं अब वर्तमान की सुख-सुविधाओं के लिए भविष्य की आय को दांव पर लगा रहे हैं। बात-बात पर लोन लेने की प्रवृत्ति इसका बड़ा उदाहरण है। क्रेडिट कार्ड के बढ़ते बकाया भी इस बात का प्रमाण हैं। आरबीआई के अनुसार, साल दर साल क्रेडिट कार्ड लोन में लगभग 30 फीसदी की वृद्धि हो रही है।

दूसरा पहलू : इकोनॉमी को रफ्तार

बचत की बजाय सेवा और सुविधाओं पर ज्याद खर्च से देश की इकोनॉमी बड़ी हो रही है। सेवा, ऑटोमोबाइल और गिग सेक्टर में तेजी युवा पीढ़ी की इसी सोच का नतीजा है।

बदलाव जो जेब से पैसा निकाल रहे

सरकारी नीतियां सुविधाओं को बढ़ावा देने वाली जरूर हैं, लेकिन इससे बचत कमजोर हो रही है। यानी सरकार की नीतियां अब 'डिमांड-ड्रिवन' (मांग आधारित) इकोनॉमी की ओर बढ़ रही हैं। इससे पैसा बाजार में आ रहा है और अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। धारणा भी बदली है, बचत का पेसा 'डेड मनी' कहलाता है। जब वही पैसा बाजार में आता है, तो मांग बढ़ती है, जिससे फैक्ट्रियां चलती हैं और रोजगार पैदा होते हैं।

  • जीएसटी और टैक्स में छूट, ताकि व्यक्ति के हाथ में खर्च करने योग्य आय ज्यादा हो।
  • सस्ता कर्ज और EMI की संस्कृति, बाय नाउ,पे लेटर और जीरो कॉस्ट EMI ने महंगी वस्तुओं को सुलभ बना दिया है। इसने बचत करने की क्षमता को किस्तों में बदल दिया है।

बचत कम होने के तीन बड़े कारण

  • महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य लागतों में उछाल ने रोजमर्रा के खर्चों को बढ़ा दिया है, जिससे बचत का हिस्सा कम हो गया। एक औसत भारतीय परिवार अपनी आय का 15 से 25 फीसदी सिर्फ बच्चों की शिक्षा पर खर्च कर रहा है। जबकि स्वास्थ्य सेवा की लागत सालाना 14 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है।
  • डिजिटल पेमेंट का मनोविज्ञान : डिजिटल पेमेंट सिस्टम ने खर्च का पूरा मनोविज्ञान ही बदल दिया। नकदी में खर्च से पहले बजट बनाया जाता है, जबकि डिजिटल पेमेंट और क्रेडिट कार्ड आदि ने बचत की प्रवृत्ति को कम कर दिया।
  • सोशल प्रेशर और दिखावा : इंस्टाग्राम और फेसबुक के दौर में दिखावे की संस्कृति ने अनावश्यक खर्चों को बढ़ा दिया। गैजेट्स और घूमने पर होने वाला खर्च अब परिवार के बजट से बाहर चला जाता है।

खर्च बढ़ा तो कर्ज भी बढ़ा

अवधिजीडीपी के अनुपात में कर्ज (%) - (भारतीय परिवारों के संदर्भ में)
जनवरी 202038.3%
दिसंबर 202236.1%
मार्च 202541.3%

जीडीपी में कम हुआ बचत का हिस्सा

वित्त वर्ष (Financial Year)जीडीपी में बचत का हिस्सा (%)
2004-0523.5%
2005-0622.3%
2021-2220.1%
2023-2418.4%

पत्रिका सर्वे

बचत की मात्रा (प्रतिशत में)लोगों का प्रतिशत (%)
बिल्कुल नहीं61%
20-30 फीसदी17%
50 फीसदी तक14%
10-20 फीसदी8%
सवाल: क्या भविष्य की बचत से ज्यादा वर्तमान की जरूरतों पर खर्च सही है?राय (%)
हां (सहमति)75%
नहीं (असहमति)25%