
कई देशों में पेट्रोल-डीजल महंगा हो गया है। (PC: AI)
Petrol Diesel Price Hike: चुनाव खत्म होते ही सरकार के सामने अब सबसे मुश्किल आर्थिक सवाल खड़ा हो गया है। सवाल यह है कि क्या पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने का वक्त आ गया है? अब तक सरकार ने जनता को राहत देने के लिए कीमतें नहीं बढ़ाईं, लेकिन हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि यह फैसला ज्यादा दिनों तक टाला नहीं जा सकता। कच्चे तेल की कीमतें लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं। सरकार को उम्मीद थी कि मिडिल ईस्ट में तनाव कम होगा, सीजफायर लंबा चलेगा और हार्मुज स्ट्रेट फिर सामान्य हो जाएगा। लेकिन मामला उल्टा पड़ गया। तनाव कम होने के बजाय खिंचता चला गया और तेल बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। अब सरकार के लिए यह इंतजार भारी पड़ने लगा है।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि महंगे कच्चे तेल और गैस की वजह से हर दिन करीब 1000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। जब ब्रेंट क्रूड 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा था, तब सरकार ने पेट्रोल पर करीब 24 रुपये और डीजल पर लगभग 30 रुपये प्रति लीटर का बोझ खुद उठाया। ऊपर से एक्साइज ड्यूटी घटाकर तेल कंपनियों को राहत भी दी गई। इसका असर सरकारी खजाने पर साफ दिख रहा है।
तेल कंपनियों की हालत भी पतली होती जा रही है। अप्रैल के आखिर तक कंपनियों का नुकसान करीब 30 हजार करोड़ रुपये पर पहुंच चुका था और मौजूदा तिमाही खत्म होने तक यह 50 हजार करोड़ रुपये के पार जाने का अनुमान है। गैस सेक्टर में अलग से 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का दबाव बताया जा रहा है।
एलपीजी सिलेंडर पर भी सरकार भारी सब्सिडी दे रही है। 14 किलोग्राम वाले हर सिलेंडर पर करीब 600 रुपये का बोझ उठाया जा रहा है। उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को अतिरिक्त राहत अलग से दी जा रही है। देश को रोज करीब 20 हजार टन गैस आयात करनी पड़ रही है। महंगे दामों पर 8 लाख टन गैस का इंतजाम किया गया है, ताकि आने वाले करीब 40 दिनों की जरूरत पूरी हो सके।
मुसीबत सिर्फ तेल के दाम तक सीमित नहीं है। समुद्री बीमा महंगा हो गया है। जहाजों को लंबा रास्ता लेना पड़ रहा है, जिससे डिलीवरी में 2 से 3 हफ्ते की देरी हो रही है और माल ढुलाई खर्च 15 से 20 फीसदी तक बढ़ गया है। कतर का बड़ा LNG टर्मिनल बंद होने से गैस बाजार पर अलग दबाव बना हुआ है।
दुनिया के दूसरे देशों ने हालात देखकर पहले ही ईंधन महंगा कर दिया है। चीन, जर्मनी, ब्रिटेन और नीदरलैंड जैसे देशों में पेट्रोल कीमतों में 20 से 27 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है। जापान, स्पेन और दक्षिण कोरिया में तो बढ़ोतरी 30 फीसदी से भी ज्यादा रही। कुछ देशों ने तो ईंधन बचाने के लिए वर्क फ्रॉम होम और चार दिन के वर्किंग मॉडल तक अपनाना शुरू कर दिया है। भारत ने अब तक ऐसे कदमों से दूरी बनाई हुई है।
सरकार की सबसे बड़ी चिंता राजनीति और अर्थव्यवस्था के बीच फंसी हुई है। अगर पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं तो असर सिर्फ वाहन चलाने वालों पर नहीं पड़ेगा। ट्रांसपोर्ट महंगा होगा, खाने-पीने का सामान महंगा होगा और महंगाई की आग दूसरे सेक्टरों तक फैल जाएगी। लेकिन दूसरी तरफ लगातार घाटा उठाना भी अब आसान नहीं बचा है।
असल चिंता यह है कि हार्मुज स्ट्रेट को लेकर अब कोई साफ तस्वीर नजर नहीं आ रही। यही रास्ता भारत की ऊर्जा सप्लाई की लाइफलाइन माना जाता है। लंबे समय तक अनिश्चितता बनी रही तो सरकार को आखिरकार जनता पर कुछ बोझ डालना पड़ सकता है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार कब तक कीमतों को थामे रख पाएगी।
Updated on:
09 May 2026 10:18 am
Published on:
09 May 2026 10:18 am
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