
MSME
व्यापार में एक पुरानी कहावत है, 'माल बेचना कला है, लेकिन पैसा वसूलना तपस्या।' भारत सरकार ने सूक्ष्म और लघु उद्योगों (MSME) की इसी 'तपस्या' को खत्म करने के लिए आयकर कानून में धारा 43B(h) को शामिल किया है
1 अप्रैल 2024 से प्रभावी यह नियम अब 2026 में पूरी तरह जमीन पर उतर चुका है, लेकिन आज भी व्यापारियों के बीच इसे लेकर कई भ्रम हैं।
सीधे शब्दों में कहें तो, यदि आप किसी 'सूक्ष्म' (Micro) या 'लघु' (Small) उद्यम से माल खरीदते हैं या सेवा लेते हैं, तो आपको उनका भुगतान एक निश्चित समय सीमा के भीतर करना होगा।
समय सीमा: अगर लिखित एग्रीमेंट है तो अधिकतम 45 दिन, और अगर एग्रीमेंट नहीं है तो मात्र 15 दिन।
पेनल्टी (आयकर का झटका): यदि आपने 31 मार्च तक भुगतान नहीं किया, तो विभाग उस खर्चे की छूट (Deduction) छीन लेगा।
परिणाम: वह राशि आपकी 'इनकम' मान ली जाएगी और आपको उस पर अपनी टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स भरना होगा। टैक्स का लाभ तभी मिलेगा, जिस साल आप असल में भुगतान करेंगे।
यहाँ एक प्रोफेशनल के तौर पर मैं 3 मुख्य बातें स्पष्ट करना चाहता हूँ:
1- सिर्फ मैन्युफैक्चरर और सर्विस प्रोवाइडर: यह नियम केवल उन वेंडर्स पर लागू है जो सामान बनाते हैं या सर्विस देते हैं। अगर आपने किसी 'ट्रेडर' (व्यापारी/रिटेलर) से माल खरीदा है, तो 45 दिनों की यह पाबंदी आप पर लागू नहीं होती।
2- उद्यम रजिस्ट्रेशन अनिवार्य: वेंडर के पास वैध 'उद्यम सर्टिफिकेट' होना जरूरी है। भुगतान करने से पहले अपने वेंडर से उनका स्टेटस (Micro, Small या Medium) जरूर पूछें। ध्यान रहे, 'Medium' एंटरप्राइज पर यह नियम लागू नहीं है।
3- चेक का खेल नहीं चलेगा: ऑडिट के दौरान केवल चेक काट देना पर्याप्त नहीं है। पैसा वेंडर के खाते में समय पर क्रेडिट होना चाहिए।
जमीनी हकीकत यह है कि MSMEs को अब समय पर पैसा मिल रहा है, जिससे उनका 'वर्किंग कैपिटल' बढ़ा है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि कुछ बड़े खरीदार अब छोटे वेंडर्स के बजाय 'मीडियम' या 'अन-रजिस्टर्ड' वेंडर्स की तलाश कर रहे हैं ताकि उन्हें भुगतान के लिए ज्यादा समय मिल सके।
वेंडर्स की लिस्टिंग: अपने सभी सप्लायर्स को 'माइक्रो', 'स्मॉल' और 'ट्रेडर' की कैटेगरी में बांटें।
एग्रीमेंट अपडेट करें: यदि आप 15 दिन से ज्यादा का समय चाहते हैं, तो लिखित एग्रीमेंट जरूर करें (जो 45 दिन से ज्यादा का नहीं हो सकता)।
MSME-1 फॉर्म: याद रखें, बड़ी कंपनियों को ROC को भी MSME भुगतान की जानकारी देनी होती है। डाटा में अंतर (Mismatch) सीधा नोटिस को दावत दे सकता है।
धारा 43B(h) कोई 'टैक्स का जाल' नहीं है, बल्कि व्यापारिक लेन-देन में अनुशासन (Discipline) लाने का प्रयास है। शुरुआत में यह कठिन लग सकता है, लेकिन लंबी अवधि में यह MSME सेक्टर की रीढ़ मजबूत करेगा। व्यापारियों को अब 'उधारी के भरोसे' नहीं, बल्कि 'नियोजन (Planning) के भरोसे' व्यापार करना होगा।
Updated on:
19 Mar 2026 12:26 pm
Published on:
19 Mar 2026 12:25 pm
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