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Success Story: गदा और मुगदर से यह स्टार्टअप लोगों को कर रहा फिट, एक दर्द से हुई शुरुआत और बना दिया ‘तगड़ा रहो’

Tagda Raho Success Story: बेंगलुरु का “तगड़ा रहो” स्टार्टअप पारंपरिक गदा और मुगदर को आधुनिक फिटनेस में शामिल कर रहा है। फाउंडर की खुद की रिकवरी से शुरू हुआ यह सफर अब देशभर में लोकप्रिय हो रहा है।

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भारत

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Pawan Jayaswal

May 02, 2026

Tagda Raho Success Story

तगड़ा रहो गदा और मुगदर से लोगों को फिट कर रहा है। (PC: AI)

Tagda Raho Success Story:आज के समय में जहां फिटनेस का मतलब सिर्फ ट्रेडमिल और कुछ मशीनों तक सीमित हो गया है, वहीं बेंगलुरु से एक ऐसा ट्रेंड निकलकर सामने आया है जो पुराने जमाने की ताकत को नए दौर में वापस ला रहा है। “तगड़ा रहो” नाम का स्टार्टअप गदा और मुगदर जैसे देसी उपकरणों को फिर से फिटनेस का हिस्सा बना रहा है और दिलचस्प बात ये है कि लोगों से रिस्पांस भी अच्छा आ रहा है।

इस तरह हुई शुरुआत

इस पूरी पहल की शुरुआत किसी बिजनेस आइडिया से नहीं, बल्कि एक मजबूरी से हुई। कंपनी के फाउंडर ऋषभ मल्होत्रा एक वक्त 75 फीसदी हाथ के लकवे से जूझ रहे थे। डॉक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन गदा और मुगदर की मदद से उन्होंने धीरे-धीरे अपना हाथ फिर से चलाना शुरू किया। यहीं से उनके दिमाग में यह बात बैठ गई कि जो चीज उन्हें ठीक कर सकती है, वो औरों के भी काम आ सकती है। और बस यहीं से “तगड़ा रहो” की नींव पड़ गई।

बैलेंस, ताकत और कंट्रोल

ये कोई आम जिम नहीं है। यहां शरीर के किसी एक हिस्से पर काम नहीं होता, बल्कि पूरा शरीर एक साथ एक्टिव होता है। गदा और मुगदर के साथ एक्सरसाइज करने में बैलेंस, ताकत और कंट्रोल तीनों की जरूरत पड़ती है। ऋषभ का कहना है कि जब आप इन उपकरणों के साथ ट्रेनिंग करते हैं, तो आपका शरीर एक यूनिट की तरह काम करता है। यही असली ताकत है।

देसी तरीका, लेकिन साइंस के साथ

पहले गदा-मुगदर सिर्फ अखाड़ों तक सीमित थे, लेकिन अब इन्हें मॉडर्न तरीके से पेश किया गया है। यहां एक्सरसाइज को इस तरह डिजाइन किया गया है कि शहर में रहने वाले लोग भी आसानी से इसे कर सकें। वर्कआउट करीब 60 से 70 मिनट का होता है, जिसमें अलग-अलग मूवमेंट्स शामिल होते हैं। खास बात ये है कि इसमें फिजियो सपोर्ट भी मिलता है, जिससे चोट का खतरा कम हो जाता है।

हर उम्र के लोग हो रहे आकर्षित

इस फिटनेस मॉडल की खास बात ये है कि ये सिर्फ युवाओं तक सीमित नहीं है। 20 साल के लड़के-लड़कियों से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक इसे अपना रहे हैं। जहां नई पीढ़ी कुछ नया और अलग ढूंढ रही है, वहीं बड़े लोग लंबे समय तक फिट रहने का तरीका खोज रहे हैं। यही वजह है कि यहां 30+ उम्र के लोगों की संख्या अधिक है।

सेना से लेकर धोनी तक का भरोसा

“तगड़ा रहो” को अब बड़े स्तर पर पहचान मिल चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसकी तारीफ की है। क्रिकेटर एमएस धोनी ने इसमें निवेश किया है। इतना ही नहीं, भारतीय सेना की पैरा स्पेशल फोर्सेस ने भी इनके साथ ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार करवाया है।

फिटनेस का नया फॉर्मूला

आजकल लोग HIIT और हाई इंटेंसिटी वर्कआउट के पीछे भाग रहे हैं, लेकिन ऋषभ मानते हैं कि फिटनेस सिर्फ तेजी से पसीना बहाने का नाम नहीं है। असली फिटनेस है संतुलन, धैर्य और लगातार अभ्यास। उनका साफ कहना है, अगर आप सिर्फ दिखने के लिए फिट हो रहे हैं, तो ये सफर लंबा नहीं चलेगा। असली मोटिवेशन अंदर से आना चाहिए।