
ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट खोलने की डेडलाइन बढ़ा दी है। (PC: AI)
US-Iran war: होर्मुज स्ट्रेट खोलने की पांच दिन की डेडलाइन खत्म हो गई। नतीजा? ईरान ने ट्रंप की कोई बात नहीं सुनी। अब ट्रंप ने इसके लिए 10 दिन और बढ़ा दिये हैं। नई डेडलाइन 6 अप्रैल 2026 है। ट्रंप ने कहा कि बातचीत बहुत अच्छी चल रही है। लेकिन बाजार के जानकार कह रहे हैं कि यह महज कूटनीति नहीं है, बल्कि अमेरिका खुद कई मोर्चों पर दबाव में है। अमेरिका-ईरान युद्ध को एक महीना हो गया है। अमेरिका और इजराइल के हमलों ने ईरान की सैन्य ताकत को काफी नुकसान पहुंचाया है, कई बड़े नेता मारे गए हैं। लेकिन जंग के मैदान में जीत और रणनीतिक लक्ष्य हासिल करना, ये दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं। और यहीं पर ट्रंप फंसे हुए हैं। डेडलाइन क्यों बढ़ाई? इसके पीछे सिर्फ एक नहीं, पांच बड़े कारण हैं:
1970 के दशक में बना पेट्रोडॉलर सिस्टम अमेरिकी आर्थिक ताकत की नींव है। इसके तहत दुनियाभर में तेल का कारोबार डॉलर में होता है, जिससे डॉलर की मांग बनी रहती है। लेकिन चीन और रूस अब दूसरी मुद्राओं में तेल खरीद-बेच रहे हैं। इस सिस्टम को बचाए रखना अमेरिका की पहली प्राथमिकता है। SMC Global Securities की वरिष्ठ विश्लेषक सीमा श्रीवास्तव कहती हैं कि ईरान को मोहलत देकर अमेरिका दरअसल कच्चे तेल की कीमतें नीचे लाना चाहता है। SEBI पंजीकृत बाज़ार विशेषज्ञ अनुज गुप्ता का कहना है कि तेल सस्ता होगा तो ईरान की मोलभाव करने की ताकत कमज़ोर पड़ेगी।
अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर ब्याज दरें यानी ट्रेजरी यील्ड बढ़ रही हैं। इसका सीधा मतलब है कि सरकार को कर्ज लेना महंगा पड़ रहा है। जंग पहले से खर्चीली है। ऊपर से कर्ज का बोझ और बढ़े तो अमेरिका के लिए मुश्किल हो जाएगी। डेडलाइन बढ़ाने से बाज़ार में थोड़ी राहत आती है और यील्ड पर दबाव कम होता है।
ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका था। अगर यह 150 डॉलर तक जाता तो महंगाई आसमान छू लेती और अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेड को ब्याज दरें और बढ़ानी पड़तीं। SEBI पंजीकृत विश्लेषक अविनाश गोरक्षकर बताते हैं कि ट्रंप प्रशासन ब्रेंट क्रूड को 80 डॉलर से नीचे लाना चाहता है। पिछली डेडलाइन के पांच दिनों में ही क्रूड 100 डॉलर से नीचे आ गया था। यह उनके लिए उत्साहजनक संकेत था।
तेल महंगा है, सप्लाई बाधित है, कंपनियों की कमाई पर असर पड़ रहा है। बाज़ार पहले से ही आने वाली तिमाहियों के नतीजों को लेकर निराश है। रूस-यूक्रेन युद्ध का असर अभी पूरी तरह खत्म भी नहीं हुआ था कि यह नई मुसीबत आ गई। गोरक्षकर कहते हैं कि एक और लंबा कमज़ोर कमाई का दौर कोई भी अर्थव्यवस्था बर्दाश्त नहीं कर सकती।
यह शायद सबसे बड़ा डर है। ईरान सऊदी अरब, UAE और कतर जैसे देशों को निशाना बना रहा था। ये सभी देश 2020 के अब्राहम समझौते का हिस्सा हैं। अगर इनमें से किसी ने भी जवाबी कार्रवाई की तो यह लड़ाई एक बड़े खाड़ी युद्ध में बदल सकती है। ट्रंप इस जंग को ईरान की सीमाओं तक सीमित रखना चाहते हैं। तस्वीर साफ है। डेडलाइन बढ़ाना कमज़ोरी नहीं है, लेकिन यह ताकत भी नहीं है। यह उस देश की मजबूरी है जो एक साथ तेल बाज़ार, अपनी अर्थव्यवस्था, अपने साझेदार देशों और एक दुश्मन को संभालने की कोशिश कर रहा है। अब देखना यह है कि 6 अप्रैल को होर्मुज खुलता है या डेडलाइन एक बार फिर आगे खिसक जाती है।
Updated on:
28 Mar 2026 04:05 pm
Published on:
28 Mar 2026 04:03 pm
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