
Protests in Iran (Photo - Washington Post)
Crisis Management: मध्य पूर्व का 'पॉवर हाउस' कहा जाने वाला ईरान इस समय आंतरिक और बाहरी चुनौतियों के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है। लेकिन ईरान की सड़कों पर मची यह अफरा-तफरी सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं है, इसका नई दिल्ली के रणनीतिक और आर्थिक हितों पर सीधा असर पड़ रहा है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान में बढ़ती अस्थिरता भारत के लिए जितनी बड़ी चिंता है, चीन और पाकिस्तान के लिए यह उतना ही बड़ा अवसर साबित हो सकता है।भारत ने पाकिस्तान को नजरअंदाज कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने के लिए ईरान के चाबहार पोर्ट (Chabahar Port Status) में भारी निवेश किया है। यह बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से 'गेम चेंजर' है। यदि ईरान (India Iran Relations) में हिंसा और अस्थिरता बढ़ती है, तो चाबहार परियोजना का काम ठप हो सकता है। ऐसे में भारत का मध्य एशिया (China Iran 400 Billion Deal) तक का व्यापारिक मार्ग बंद होने के कगार पर पहुँच जाएगा, जिसका सीधा फायदा चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) और पाकिस्तान के 'ग्वादर पोर्ट' (Pakistan Gwadar vs Chabahar) को मिलेगा।
ध्यान रहे कि ईरान में जब भी पश्चिम विरोधी भावनाएं भड़कती हैं या अमेरिकी दबाव बढ़ता है, तो ईरान मजबूरी में चीन की ओर झुकता है। चीन पहले ही ईरान के साथ 400 बिलियन डॉलर के निवेश का समझौता कर चुका है।
ईरान में अस्थिरता का लाभ उठा कर चीन वहां के ऊर्जा संसाधनों पर एकाधिकार जमा सकता है।
पाकिस्तान हमेशा से भारत के चाबहार प्रोजेक्ट को अपने ग्वादर पोर्ट के लिए खतरा मानता रहा है। ईरान में अशांति का मतलब है भारत के प्रभाव में कमी, जिससे पाकिस्तान को क्षेत्रीय राजनीति में दोबारा बढ़त मिल सकती है।
ईरान ऐतिहासिक रूप से कश्मीर मुद्दे पर भारत का समर्थन करता रहा है या कम से कम तटस्थ रहा है। यदि वहां शासन बदलता है या कट्टरपंथियों का प्रभाव बढ़ता है, तो भारत को इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) जैसे मंचों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी ईरान से जुड़ी हुई है। भले ही प्रतिबंधों के कारण तेल आयात कम हो, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान पर पहुँचा सकते हैं।
भारत, रूस और ईरान मिल कर इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) पर काम कर रहे हैं। यह कॉरिडोर यूरोप तक पहुँचने का सबसे छोटा रास्ता है। ईरान की हिंसा इस महत्वाकांक्षी योजना को वर्षों पीछे धकेल सकती है। इसका सीधा मतलब है कि भारत को अपने व्यापार के लिए फिर से स्वेज नहर जैसे लंबे और महंगे रास्तों पर निर्भर रहना होगा।
भारतीय रणनीतिकार: विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को "वेट एंड वॉच" की नीति छोड़ कर ईरान में अपने निवेश को बचाने के लिए कूटनीतिक सक्रियता बढ़ानी होगी। अंतरराष्ट्रीय नजरिया: अमेरिका के कड़े रुख ने ईरान को चीन की गोद में धकेल दिया है, जो एशिया में शक्ति संतुलन (Power Balance) को बिगाड़ सकता है।
आने वाले हफ्तों में भारतीय विदेश मंत्रालय चाबहार प्रोजेक्ट की सुरक्षा और निरंतरता को लेकर ईरानी अधिकारियों के साथ एक आपातकालीन बैठक कर सकता है। वहीं, चीन के विदेश मंत्री की तेहरान यात्रा इस बात का संकेत देगी कि बीजिंग इस मौके को भुनाने के लिए कितना तैयार है।
बहरहाल, इस पूरे संकट का एक मानवीय और सांस्कृतिक पक्ष भी है। ईरान में हजारों भारतीय छात्र और कारोबारी फंसे हुए हैं। यदि हिंसा और बढ़ती है, तो भारत को एक और बड़ा 'निकासी अभियान' (Evacuation Mission) चलाना पड़ सकता है। साथ ही, ईरान की सांस्कृतिक विरासत का नष्ट होना पूरी दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति होगी।
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Published on:
14 Jan 2026 08:28 pm

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