
नई दिल्ली: दिल्ली NCR में प्रदूषण का हाल बुरा है ये तो सभी जानते हैं, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट इस पर सख्त हो रहा है । देश की उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और दिल्ली परिवहन निगम से इस बाबत सवाल पूछा है। कोर्ट ने पूछा है कि प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों का पता लगाने के लिए रिमोट सेंसिंग टेक्नोलॉजी कब से लागू कर रहे हैं।
एनवायरमेंट पॉल्यूशन कंट्रोल अथॉरिटी के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उन्होंने 16 जुलाई को संबंधित एजेंसियों सड़क परिवहन मंत्रालय, दिल्ली परिवहन विभाग के साथ बैठक की थी। जिसमें उत्सर्जन की निगरानी के लिए रिमोट सेंसिंग के क्रियान्वयन पर विचार विमर्श किया गया।
सुप्रीम कोर्ट में वकील ने बताया कि हॉंगकांग और चीन में रिमोट सेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है । वहां रोड साइड पर मशीने लगाई गई हैं। जिससे पार्टिकुलेट मैटर और अन्य जहरीली गैसें जैसे नाइट्रोजन ऑक्साइड NOx और सल्फर ऑक्साइड SOx का पता लगाता है।
हमारे देश में भी हो रहा है इस्तेमाल-
यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि हमारे देश में कोलकाता और पुणे में इस तकनीक का इस्तेमाल रहा है और 1.76 लाख वाहनों पर इसका प्रयोग किया जा चुका है।
दिल्ली में लगेंगी 10 मशीनें-
ईपीसीए की रिपोर्ट में कहा है कि रिमोट सेंसिंग तकनीक डीजल वाहनों का उत्सर्जन बताती है, इनके जरिए वाहनों के नंबर प्लेट को सेंसिंग किया जाता है। दिल्ली के लिए कम से कम 10 मशीनों की जरूरत है और एक मशीन की लागत 2.5 करोड रू है। ईपीसीए ने परिवहन मंत्रालय को रिमोट सेंसिग प्रोग्राम के तहत उत्सर्जन पर नजर रखने के लिए केंद्रीय मोटर वाहन एक्ट में नियम बनाने की बात कही है।
पार्किंग स्पेस भी है समस्या-
ईपीसीए यानि इनवायरमेंट पॉल्यूशन कंट्रोल अथॉरिटी ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट दाखिल की है। अपनी रिपोर्ट में ईपीसीए ने प्रदूषण के लिए पार्किंग की समस्या को बड़ा कारण बताया है। इसके साथ ही पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्रधिकरण ने एक से ज्यादा कारें रखने वालों से ज्यादा मासिक फीस वसूलने का प्रस्ताव रखा है। ईपीसीए ने लाजपत नगर का हवाला देते हुए कहा कि यहां क्षमता से दोगुनी कारें हैं। लाजपत नगर में 1830 कारों के लिए पार्किंग की व्यवस्था है, जबकि 1689 अतिरिक्त कार पार्किंग की जरूरत है।
Updated on:
31 Jul 2019 07:40 pm
Published on:
31 Jul 2019 05:26 pm
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