
20 Workers return from muscat
रीतेश रंजन
छह महीने तक तिल-तिल मरने जैसे हालात का सामना कर जब राजस्थान मूल के बीस मजदूरों ने जयपुर एयरपोर्ट पर पांव रखा तो मानो उनकी नई जिन्दगी की शुरुआत हुई। उनकी आंखें नम थी और अपनों से मिलने की खुशी। मस्कट से जयपुर तक की दूरी करते वक्त इन श्रमिकों के जेहन में केवल उन्हीं पलों की स्मृति थी जो उन्होंने गत 6 महीनों में बिताए थे। इनकी सकुशल राजस्थानी वापसी में राजस्थान पत्रिका ने अहम भूमिका निभाई और एक अभियान के तौर पर इस मसले को उठाया। पत्रिका के इस अभियान के बाद मस्कट स्थित नियोक्ता कंपनी और विदेश मंत्रालय व दूतावास हरकत में आया था।
यह था मामला
गौरतलब है कि मोटी तनख्वाह और बेहतर जीवन की लालसा पाले राजस्थान के सीकर, चूरू, झुंझनूं और नागौर जिले से करीब 20 लोग अप्रेल महीने में राजस्थान से मस्कट गए थे। उन्हें यहां के एक एजेंट ने मिस्त्री और कारपेंटर के काम के लिए वहां फर्जी कांट्रेक्ट बनाकर मस्कट अल रमूज कंपनी में काम करने के लिए भेजा था। वहां उनसे कारपेंटर व मिस्त्री के काम के बजाय पत्थर तुड़वाए गए। उनका मेहनताना रोक दिया गया। भारतीय दूतावास से मदद का शुरुआती अनुभव इनके लिए काफी कड़वा रहा।
इसकी भनक जब कंपनी को लगी तो इनका जीना दूभर कर दिया। उनकी यातना भरी जिन्दगी का मसला राजस्थान पत्रिका ने उठाया। समाचारों की शृंखला प्रकाशित करने के साथ ही विदेश मंत्रालय, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज , विदेश राÓय मंत्री जनरल वी. के. सिंह, केंद्रीय मंत्री पी. पी. चौधरी को ट्वीट भी किया गया। अंत में यह मिशन कामयाब रहे और सभी मजदूर मस्कट से वाया दिल्ली होते हुए शाम चार बजे जयपुर पहुंचे। यहां पहुंचकर इन सभी ने राजस्थान पत्रिका का शुक्रिया अदा किया। बहरहाल, इन मजदूरों को इस बात की कसक है कि छह महीने पसीना बहाने के बाद भी इनको खाली हाथ घर लौटना पड़ा।
कोर्ट का फरमान लागू करने में देरी
मस्कट से वापस वतन लौटे मजदूरों का आरोप है कि स्थानीय कोर्ट ने उनकी वतन वापसी के आदेश 27 नवम्बर को ही दे दिए थे लेकिन भारतीय दूतावास और नियोक्ता कंपनी दोनों ने टिकट बनवाने में विलम्ब किया। फिर मजदूरों ने कोर्ट के अधिकारियों की शरण ली जिनके दखल के बाद टिकट बने। इस बीच पत्रिका संवाददाता भी लगातार इन श्रमिकों व दूतावास के अधिकारियों से संपर्क में रहा।
कोर्ट की दखल से मिला टिकट
हमारे साथ होने वाले अन्याय के मामले की कोर्ट में सुनवाई के करीब दो तीन हफ्ते बाद हमने कोर्ट को फिर से संपर्क किया। कोर्ट के अधिकारी के फोन के बाद कंपनी ने हमें टिकट बना कर वतन वापस भेजा।
विकास कुमार, सीकर
मांग लो मीडिया से मदद
जब भी हम अपने वेतन और वतन वापसी के बारे में दूतावास से गुहार लगाई तब-तब उसका आचरण उपेक्षापूर्ण ही रहा। दूतावास का बर्ताव कदाचित कंपनी के पक्ष में ही दिखाई पड़ता था। हमें अपमानित करते हुए मीडिया से मदद मांगने को कहा जाता था।
कालूराम, चूरू
Published on:
19 Dec 2017 09:39 pm
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