
तपस्या से आत्मा बन सकती है निर्मल
चेन्नई. माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने ठाणं आगमाधारित प्रवचन में कहा आगम में अनशन, अवमोदरिका, भिक्षाचर्या, रस-परित्याग, कायक्लेश और प्रतिसंलीनता छह प्रकार के बाह्य तप बताए गए हैं। अध्यात्म के क्षेत्र में तप को धर्म बताया गया है। तपस्या से कर्म कटते हैं, पाप कर्म झड़ते हैं और आत्मा निर्मल बनती है। जिस प्रकार आग में तपकर सोने में निखार आ जाता है, उसी प्रकार तपस्या आत्मा के रूप को निखारती है। बाह्य तप का अर्थ होता है, जिसका प्रभाव बाहर भी देखा जा सके।
अनशन बाह्य तप का पहला प्रकार है। आहार का परित्याग कर देना अनशन होता है। बेला, तेला, उपवास आदि एक निश्चित सीमा के लिए होते हैं तो कुछ अनशन आजीवन रूप में भी स्वीकार कर लिए जाते हैं। लम्बी-लम्बी तपस्याएं भी होती हैं। तपस्या का असर बाहरी रूप में दिखाई भी देता है। शरीर में कमजोरी आ जाना, चलने-फिरने में कठिनाई होना यह तपस्या के बाहरी प्रभाव होते हैं, जो दिखाई देते हैं। अवमोदरिका तपस्या का दूसरा प्रकार होता है। जो आदमी भूख से कुछ कम खाए। अर्थात् खाने की अधिक अपेक्षा होने के बावजूद भी वह आदमी कम भोजन ग्रहण करे तो वह अवमोदरिका हो जाती है। भूख से कम खाना एक प्रकार से स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी हो सकता है। बाह्य तप का तीसरा प्रकार रस परित्याग है। घी, तेल, दूध आदि का रसयुक्त विगयों का वर्जन रस परित्याग तप होता है। कायक्लेश बाह्य तप का चैथा प्रकार है। शरीर को कष्ट देकर काय स्थिरता भी तपस्या होती है।
पद्मासन, ध्यानासन, कायोत्सर्ग आदि की स्थिति में लंबे समय तक शरीर को स्थिर रखना भी तपस्या होती है। बाह्य तप का छठा प्रकार प्रतिसंलीनता है। इन्द्रियों को बाह्य आकर्षणों से विरत रखने का प्रयास भी तपस्या होती है। इस प्रकार व्यक्ति इन छह प्रकार की तपस्याओं के माध्यम से कर्म निर्जरा कर सकता है और अपनी आत्मा को निर्मल बना सकता है। व्यक्ति को शब्दों के उपयोग में भी उनोदरी करने का प्रयास करना चाहिए। तप से कर्म निर्जरा होती है। इसलिए आदमी को तपस्या के माध्यम से अपनी आत्मा को निर्मल बनाने का प्रयास करना चाहिए।
Published on:
20 Nov 2018 07:37 pm
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