
Chang fagan of Rajasthan
चेन्नई. चंंग की थाप, पैरों में घुंघरु, सिर पर पर साफा, धोती व कमीज, इन सब पर थिरकते पैर और फागुन गीतों की मस्ती। कुछ ऐसा ही दृश्य था चेन्नई के पुझल शक्तिवेल नगर में। होली के पर्व के अवसर पर श्री वीर तेजा गैर मंडल के सदस्यों ने चंग की थाप पर फागुनी गीतों की बेहतरीन प्रस्तुति दी। श्री वीर तेजा जाट नवयुवक मंडल के निर्माणाधीन वीर तेजा मंदिर परिसर में आयोजित इस फागुनी महोत्सव का रस देखते ही बन रहा था। इस दौरान जोरजी चोंपावत घुड़ला बाजारों में खडिय़ा रे..., हां रे फागण फरवरियो..., होळी आइगी..., सेला बाजारां में कांईं..., मेहंदी वाळो खेत..., समेत कई फागत गीतों की प्रस्तुति से समूचा माहौल ही फागणमय हो गया। पारम्परिक परिधान में सजे-धजे युवकों ने चंग की थाप एवं घुंघरू की खनक पर फागुनी गीतों की प्रस्तुति पर देर रात तक चलती रही। पर्व-त्यौहार हमारे जीवन को रसमय बनाते हैं। जिस तरह राजस्थान में होली का पर्व उल्लास व उमंग के साथ मनाया जाता है वैसे ही खास अंदाज में इन दिनों प्रवासी राजस्थानी इसे जीवंत बनाने में योगदान दे रहे हैं। खासकर नई पीढ़ी को भी इन पर्व की महत्ता के बारे में बता रहे हैं।
इन्होंने दी खास प्रस्तुति
श्री वीर तेजा गैर मंडल के वरिष्ठ सदस्य मांगीलाल लूम्बरोड मालकोसनी, पेमाराम खीचङ धनारी कला, मोहनलाल गोदारा कुङछी, सोहनलाल जाणी, हनुमान राम खदाव, विष्णु राम सारण, हरिराम जाट, रमेश खदाव, ओम खोजा, भुण्डाराम ढाडिया, तेजाराम सारण, गणपतराम कस्वां, नाथूराम जाखङ, राजूराम चांगल, शिवलाल भाना, हरिश भडियार, दिनेश ढाका, बगदाराम सारण, मुन्नालाल डूडी, लक्ष्मण गोलिया, देवाराम काणिया, कालूराम पिण्डेल, नेमाराम ग्वाला, गौतम हुण्डा, हनुमान झुंझारिया व रमेश काला समेत श्री वीर तेजा गैर मंडल के सदस्यों ने चंग की थाप पर फागुनी गीतों की राजस्थानी अंदाज में प्रस्तुति दी। प्रारम्भ में राजस्थान पत्रिका चेन्नई के मुख्य उप संपादक अशोक सिंह राजपुरोहित ने राजस्थान की कला संस्कृति व परम्पराओं के बारे में बताया।
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हम फिर से कर रहे जीवंत
फागुन के गीतों की बात अब पुरानी होती जा रही है। हमें इसे फिर से पुनजीर्वित करने की जरूरत है। नई पीढ़ी को हमारे रीति-रिवाज, परम्पराओं से अवगत कराना जरूरी है। आज गावों में बहुत कम जगह पर फागुन के गीत सुनने को मिल रहे हैं। महानगरीय संस्कृति के शोर में फागुन गीत शायद सुनाई कम देने लगे हैं। सच तो यह भी हैं कि ऐसे गीतों से पर्व के प्रति जो अहसास होता था वह कम होता जा रहा है। ऐसे में हम पिछले छह-सात वर्षों से हर वर्ष होली के मौके पर फागुन गीतों का कार्यक्रम में सभी का सहभागिता से इसे लोकप्रिय बनाने का प्रयास कर रहे हैं। यह भी प्रयास रहता है कि हम राजस्थानी वेशभूषा के साथ इसकी जीवंत प्रस्तुुति दे सकें।
मांगीलाल लूम्बरोड मालकोसनी, अध्यक्ष, श्री वीर तेजा जाट नवयुवक मंडल, चेन्नई।
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पर्व की महत्ता को रखें कायम
हमारे पुरखों ने शायद फागुन की परम्परा इसीलिए शुरू की थी कि हम एक-दूसरे पर खुलकर हंस सकें। अपनी कमजोरियों पर ठहाके लगा सकें। लेकिन लगता हैं कि कुछ दशकों से हमारे अंदर का सहज हास्य-व्यंग्य बोध तेजी से खत्म होता जा रहा है। इसी परम्परा को फिर से सभी के सामने प्रस्तुत करने का हमारा प्रयास हैं। इसे अब निरन्तर रखने का प्रयास किया जाएगा। इसी से हमारे पर्व की परम्परा कायम रह सकेगी। पर्व व त्यौहार की महत्ता को हमें कायम रखना है।
हनुमानराम खदाव, उपाध्यक्ष, श्री वीर तेजा जाट नवयुवक मंडल, चेन्नई।
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हमारी परम्पराओं को जानना जरूरी
एक समय वह भी था जब फागुन की गैर को देखने आसपास से लोग इकट्ठे होते थे। रातभर ऐसे कार्यक्रम चलते थे। लोगों को सालभर इसका इंतजार रहता था। तब होली का पर्व पूरा रसमय बन जाता था। गांव के बुजुर्ग व युवा दोनों अपने हाथों में हाथ डालकर फागुन गीत उत्साह से गाते थे। आज ऐसे कार्यक्रम कम देखने को मिलते हैं। चेन्नई के लिए यह अच्छी बात हैं कि अब उन्हीं परम्पराओं को फिर से चालू करने का प्रयास किया गया है। इससे हमारे रीति-रिवाज व परम्पराओं के बारे में जानने व समझने का अवसर मिल सकेगा।
विष्णुराम सारण, सदस्य, श्री वीर तेजा गैर मंडल, चेन्नई।
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जुड़ रहे नए लोग भी
बसंत पंचमी से ही होली गीत गाने वालों की टोली सजने लगती थी जो महाशिवरात्रि आते-आते अपने बुलंदियों पर पहुंच जाती थी। अब ऐसा कुछ नहीं है। इसीलिए इस तरह के आयोजन हर साल रखे जाने चाहिए। इस आयोजन में चेन्नई महानगर के विभिन्न इलाकों से प्रवासी शामिल होते हैं। कोशिश यही रहती हैं कि परम्परागत वेशभूषा के साथ प्रस्तुति दी जाएं। हर साल नए लोग भी इससे जुड़ रहे हैं। होली के दिन विशेष कार्यक्रम भी रखा जाता है। जिसमें बड़ी संख्या में प्रवासी शामिल होते हैं।
रमेश खदाव, सदस्य, श्री वीर तेजा गैर मंडल, चेन्नई।
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बढ़ती है सहयोग की भावना
एक जमाना वह भी था जब हौदी के अन्दर रंग घोलकर भी लगाया जाता था। अब तो पिचकारियों के दिन भी लद चुके हैं। शुद्ध रंग की जगह रासायनिक रंग आ गए हैं। फिर भी दक्षिण भारत में होली के पर्व को उसी अंदाज में मनाने का प्रयास किया जा रहा है जिस अंदाज में राजस्थान में होली मनाई जाती है। इससे लोगों से जुडऩे का अवसर मिल रहा है। आपस में प्यार व सहयोग की भावना का भी विकास होता है। यह हमारे लिए खासकर प्रवासियों के लिए अच्छी बात है।
तेजाराम सारण, सदस्य, श्री वीर तेजा गैर मंडल, चेन्नई।
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फैले संस्कृति की महक चहुंओर
एक समय था जब फागुन आते ही गांवों में देर रात तक फागुन के गीत गाए जाते थे। चाहे बूढ़े हो या जवान। सभी एक रंग में रंग जाते थे। फिजाओं में अबीर-गुलाल के साथ लोक संस्कृति की महक फैली रहती थी। घंटों लोक गीत व नृत्य पर लोग झूमते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। समय के साथ होली का रंग फीका पडऩे लगा है। हालात यह बन रहे हैं कि होली का फाग अब इतिहास बनने की ओर हैं। हमें इस परम्परा व हमारे रीति-रिवाज को कायम रखने के लिए आगे आना चाहिए।
पेमाराम खीचड़, वरिष्ठ सदस्य, श्री तमिलनाडु जाट समाज, चेन्नई।
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Published on:
05 Mar 2020 11:06 pm
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