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देशराग की युवा ललकार बालकवि बैरागी

मध्यप्रदेश के पश्चिमी सिरे पर बसे ‘मनासा’ को बालकवि बैरागी ने राजनीति की कर्मभूमि और साहित्य की धर्म भूमि के रूप में अंतर्राष्ट्रीय पहचान दी है। राजनी

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Deshagaan's youth challenge Balkavi Baragi

Deshagaan's youth challenge Balkavi Baragi

चेन्नई।मध्यप्रदेश के पश्चिमी सिरे पर बसे ‘मनासा’ को बालकवि बैरागी ने राजनीति की कर्मभूमि और साहित्य की धर्म भूमि के रूप में अंतर्राष्ट्रीय पहचान दी है। राजनीति ने उन्हें भोपाल और दिल्ली में नवाजा, तो साहित्य की मंचीय पुकार ने उन्हें कालजयी बना दिया। मैंने उनकी कविता पनिहारिन सुनी ‘मोटी मोटी आंखां में नानो नानो काजर, आंखां लागे नवी नवी’ तो लगा कि वे शृंगार के कवि हैं। उन दिनों हिंदी कविता की पनिहारिनें फिल्मी हिरोइनों पर भी भारी पड़ती थीं।


पर बाद में बालकवि की हड्डियों का फास्फोरस युवा पीढ़ी और युद्ध के मोर्चों पर चमका तो युवाओं में उफान सा आ गया। भला हो स्वर्गीय मुख्यमंत्री कैलाशनाथ काटजू का कि वे धापूबाई द्वारिका दास बैरागी के बेटे नंदरामदास को सदा सर्वदा के लिए ‘बालकवि’ नाम दे गये। चार-पांच साल की अवस्था में भीख का कटोरा थामने वाले और २३ बरस तक जूता न पहनने वाले इस कवि में वो आह्वान गमकता है कि मुख्यमंत्री काटजू 45 मिनट के भाषण में से 40 मिनट बालकवि को गाने के लिए मजबूर करते हैं और 5 मिनट में अपना भाषण खत्म कर देते हैं।

बालकवि ने विक्रम विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया। प्रोफेसर पी.डी. शर्मा ने इंदौर के प्लेटफार्म पर बालकवि को पहचान कर इंटरमीडिएट का फार्म भरवाया और प्रख्यात कवि डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन ने एम. ए. तक शिक्षा दी। लेकिन बालकवि के लिए गुरु तो मां ही है और उसी का गुरु मंत्र उनके जीवन की अनुगूंज है - ‘अरे ये दिन भी नहीं रहेंगे रे .... काम कर।’ यही उनके जीवन का चरैवेति सूत्र है। चौथी क्लास में वाद-विवाद प्रतियोगिता से हेड मास्टर से मिला दो रुपए का इनाम और बाद में तराना जिला उज्जैन के कवि सम्मेलन में सात रुपये के मानदेय से भीख का कटोरा उनके हाथ से सदा के लिए चलता बना।

बालकवि के बहुतेरे काव्य संग्रह बच्चों से लेकर जवानों तक को आंदोलित करने वाले हैं। मालवी के तो वे मीठे बोल वाले मयूरपंखी कवि हैं। ‘मनुहार भाभी’ कथा-संग्रह पर फिल्म भी बनी है। पर उनका गद्य भी पद्य से कम वजनदार नहीं है। धर्मवीर भारती ने ‘कच्छे के पदयात्री’ संस्मरण को धर्मयुग में किश्तवार प्रकाशित किया और कह भी दिया यदि कविता छापेंगे तो पाठक कम हो जाएंगे, गद्य छापेंगे तो पाठक संख्या बढ़ जाएगी। राजेंद्र जोशी ने ‘नंदा बाबा- फक़ीर से वज़ीर’ भी संपादित की है। और दूरदर्शन ने टेलीफिल्म भी बनाई। कल का कटोरा और आज का शिखर पुरुष, आज अनुभूति का आत्मीय राग है।

‘मंगते से मंत्री तक’ की अनछपी आत्मकथा लिखने वाले बालकवि जिंदगी के पहाड़ की खड़ी चढ़ाई चढ़ते चले गए। शिखर पर परचम लहराया पर तलहटी में बसे लोगों से दूर नहीं हुए। उनका एक ही ध्येय वाक्य है ‘जो तना अपनी कोंपल का स्वागत नहीं करता वह ठूंठ हो जाता है।’

बालकवि की कविताई में तेज बहती नदी का प्रवाह है। झरनों का राग है। पर अंगारों की चेतना जवानों को सीधे मोर्चे की याद दिलाती है। जीवन के अंधेरों में वे दीवट हैं।
उजाले लाने वाला दीपक हैं, पर अंधेरे के खिलाफ लड़ाई में कहते हैं- ‘संग्राम यह घनघोर है, कुछ मैं लड़ूँ, कुछ तुम लड़ो।’ वह महाकवि रामधारी सिंह दिनकर की तरह इन अंधेरों में सूरज का वंशज हैं। राग भैरवी के वे गायक हैं। आस्था की तीर्थ-प्रार्थना है। नारी शक्ति का जागृति मंत्र है। प्रकृति और पर्यावरण के चितेरे हैं। छिनाल और दलाल व्यवस्थाओं के भंजक हैं। कवि के हृदय में हिम्मत और ललाट पर मेहनत के मोती हैं। इसीलिए चुटकियों में मुश्किलों को हल करते हैं। इनकी कविताएं इतिहास का स्वर है पुरखों के कर्ज को चुकाने की प्रतिज्ञा है। बदलते जमाने के हिंदुस्तान का सपना है। पर आकांक्षा एक ही है ‘मुझे हमेशा पैदा करना मेरे हिंदुस्तान में।’

बालकवि की राजनैतिक यात्रा अपने दम पर रही। दो बार विधायक और मध्यप्रदेश शासन में मंत्री पद। लोकसभा और राज्यसभा में सदस्य। कई संसदीय समितियों में सलाहकार और हिंदी के साथ भारतीय भाषाओं की लड़ाई लडऩे वाले भाषा प्रेमी। पर नैतिक मूल्यों और पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता के सदाबहार राही। साहित्य में न कभी राजनीति की, ना उसका साहित्यिक वर्चस्व के लिए इस्तेमाल किया।

वे जितने शीर्ष नेतृत्व के चहेते रहे, उतने ही आम आदमी के भी। बड़ी बात यह है कि 86 वर्ष में भी उनका बालपन, उनका विनोदी व्यंग्य, उनका युवा स्वर जनता को खींचता है। विशिष्ट बनकर दूर नहीं होता।

बालकवि बैरागी का भावभीना स्वागत

वरिष्ठ साहित्यकार, विचारक एवं कवि बालकवि बैरागी का शनिवार रात चेन्नई एयरपोर्ट पर अनुभूति संस्था के पदाधिकारियों ने भावभीना स्वागत किया। अनुभूति के अध्यक्ष डॉ. ज्ञान जैन, उपाध्यक्ष रमेश गुप्त नीरद, ईश्वर करुण, महासचिव गोविन्द मूंदड़ा, प्रीतिबाला जैन, पुष्पा मूंदड़ा और विजय गोयल ने उनका शॉल ओढ़ाकर व पुष्पगुच्छ भेंटकर स्वागत किया।
महासचिव ने बताया कि इस वर्ष का अनुभूति सम्मान बालकवि बैरागी को दिया गया है।

इस सिलसिले में चेटपेट के हेरिंगटन रोड स्थित चिन्मया हैरिटेज सेंटर में ‘अनुभूति सम्मान बालकवि बैरागी के नाम’ कार्यक्रम रखा गया है। मुख्य अतिथि राजस्थान पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी अनुभूति सम्मान से बालकवि को नवाजेंगे जिन्होंने साहित्य के क्षेत्र में अविस्मरणीय योगदान दिया है। कोठारी का इस अवसर पर विशेष उद्बोधन होगा। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि जी. एम. मॉड्यूलर प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ जयंत जैन होंगे। कार्यक्रम में उपस्थित दर्शकों को बालकवि बैरागी अपनी कविताओं व गीतों की ओजमय प्रस्तुति से रस विभोर करेंगे।

बी. एल. आच्छा