
ई- लोक अदालत : सहायक न्यायिक व्यवस्था भी मांगे बैसाखी
पी. एस. विजयराघवन
देश के पच्चीस उच्च न्यायालयों में साल दर साल बढ़ते लम्बित मामलों के बीच ई-लोक अदालतों ने उम्मीद जगाई थी कि संभवत: याचिकाओं का पारस्परिक विमर्श से जल्द निपटारा हो जाएगा। लेकिन प्राप्त आंकड़े संतोषजनक नहीं है। गत तीन सालों में देश के २८ राज्यों में ई-लोक अदालतों ने करोड़ों मामलों की सुनवाई की लेकिन निपटारा बमुश्किल १८ प्रतिशत केसों का हो पाया। तमिलनाडु में ई-लोक अदालतों को लेकर केंद्र सरकार के पास कोई आंकड़ा नहीं था।
कोविड महामारी के दौरान, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के तत्वाधान में, विधिक सेवा प्राधिकरणों ने एकीकृत तकनीकी से लोक अदालत को आभासी मंच देकर इसे ई-लोक अदालत का स्वरूप दिया था। इनका आयोजन पूर्व- मुकदमेबाजी (प्रि-लिटिगेशन) और लम्बित मामलों की संख्या के आधार पर किया जाता है। २७ जून २०२० को पहली लोक अदालत मध्यप्रदेश में आयोजित की गई थी।
सवा तीन करोड़ मामले महाराष्ट्र से
जून २०२० से जनवरी २०२३ तक ई लोक अदालतों ने प्रि-लिटिगेशन और अदालतों में लम्बित कुल ३ करोड़ ४४ लाख ९९ हजार १०७ मामले लिए और इनमें से ६१ लाख ०९ हजार ६५१ केसों का ही निपटारा हुआ। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि लम्बित मामलों की निवारक प्रणाली के रूप में बनी यह इस व्यवस्था में भी न्याय मिलने में समय लग रहा है। इन तीन सालों में सबसे ज्यादा ३.२५ करोड़ केस महाराष्ट्र में ही लिए गए है और जहां लोक अदालतों से ५१.४३ लाख केसों का निपटान हुआ है।
राज्यों की लोक अदालतों में लम्बित मामले
महाराष्ट्र के बाद कर्नाटक की ई-लोक अदालतों में ३.२२ लाख केस सुनवाई के लिए गए। लम्बित मामलों के निपटान के इस उपाय पर राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल में कहा था कि लोक अदालतों के पास कोई न्यायिक शक्ति नहीं है। वह केवल पक्षकारों के बीच समझौते के आधार पर ही फैसला दे सकती है।
राज्य लिए गए मामले निपटान
गुजरात २८२२१४ १६००१२
कर्नाटक ३२२९६२ १८८४१२
मध्यप्रदेश ४०२५३ ८६९७
राजस्थान ९४५९० ३६११२
(स्रोत : लोकसभा में विधि मंत्री किरेन रीजीजू का पेश जवाब)
हाईकोर्ट में लम्बित मामलों की संख्या ३४ प्रतिशत बढ़ी
दिसम्बर २०१८ की तुलना में देश के २५ उच्च न्यायालयों में लम्बित मामलों की संख्या करीब ३४ प्रतिशत बढ़ गई है। मद्रास हाईकोर्ट में ३१ दिसम्बर २०२२ को ५५००८३ मामले लम्बित थे। सभी हाईकोर्ट में इन पांच सालों के आंकड़े इस प्रकार है।
वर्ष न्यायालयों में लम्बित मामले
२०१८ ४४४८९२६
२०१९ ४६५७३५४
२०२० ५६४२५६७
२०२१ ५६४९०६८
२०२२ ५९७८७१४
(स्रोत : राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड)
ए. एम. पलनीमुत्तु, वरिष्ठ अधिवक्ता, मद्रास हाईकोर्ट
पक्षकारों के माइंड सेट की अहम भूमिकाई-लोक अदालतों में भी लम्बित मामले दर्शाते हैं कि इस उपाय के संतोषजनक परिणाम नहीं मिल सके हैं। वस्तुत: यह एक सहायक व्यवस्था है जो पक्षकारों के माइंड सेट पर भी निर्भर करती है। साथ ही नई प्रौद्योगिकी को अपनाने में संकोच भी एक वजह है जिससे इनमें भी निपटारे का अनुपात कम है। इस बारे में जागरूकता लाई जानी चाहिए।
Published on:
24 Mar 2023 05:52 pm
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