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Kolu Dolls: दुनियाभर में जाते हैं विलाचेरी गांव में मिट्टी के बने ईसा मसीह और सांता की मूर्तियां

- मदुरै के विलाचेरी गांव कोलू टॉयस बनाने के लिए प्रचलित

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दुनियाभर में जाते हैं विलाचेरी गांव में मिट्टी के बने ईसा मसीह और सांता की मूर्तियां

दुनियाभर में जाते हैं विलाचेरी गांव में मिट्टी के बने ईसा मसीह और सांता की मूर्तियां

मदुरै.

मदुरै से 10 किमी दूर कन्याकुमारी हाईवे पर विलाचेरी गांव है। कहा जाता है कि यहां कि मिट्टी सोना उगलती है। 1400 की आबादी वाले 300 परिवार के इस गांव में वेलालर जाति के लोग रहते हैं और यहां का हर परिवार का पेशा मिट्टी के खिलौने और मूर्तियां (कोलू टॉयस) बनाना है।

क्रिसमस से पहले गांव के लोग मैरी, जोसेफ, बेबी जीसस, शेफर्ड, स्वर्गदूतों और मवेशियों के मूर्तियां बनाने के काम में जुट गए है। ये लोग नवरात्रि और विनायक चतुर्थी के लिए गुडिय़ा भी बनाते हैं और क्रिसमस पालना गुडिय़ा उनकी आय का मुख्य स्रोत है। 300 परिवारों में से प्रत्येक के घरों में बड़ा हॉल है जहां वे इन मूर्तियों को आकार में ढालते और रंगते हैं।

100 सालों से कर रहे काम
कुल्लर हैंडीक्राफ्ट आर्टिसन वेलफेयर एसोसिएशन के सलाहकार एम. रामलिंगम ने कहा कि वे यह काम सौ सालों से कर रहे हैं। इस गांव के हर हाथ भगवान राम से लेकर गणपति को गढ़ते हुए सध गए हैं। यहां के लोगों को न तो किसी सरकारी मदद की दरकार है और न ही किसी सरकारी खरीद की। प्रत्येक परिवार का अपना सांचा प्राचीन चित्रों और मूर्तियों से प्रेरित होता है। डिजाइनर भी सुधार करते रहते हैं और नई तकनीक को अपनाते हैं। उनकी विशिष्टता को मान्यता देते हुए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय ने हाल ही में सामुदायिक उत्पादन इकाई स्थापित करने के लिए विलाचेरी को 6 करोड़ रुपए मंजूर किए।

सलाना 10 लाख रुपए तक कमाई
यह गांव दिन-रात काम करता है। हर घर की चौखट पर धूप में सूख रहे तरह-तरह के रंग-बिरंगे खिलौने मिल जाएंगे। गांव का हर घर 10 लाख रुपए तक सालाना कमा लेता है। हर त्योहार के मद्देनजर इनको मूर्तियां बनाने का ऑर्डर मिलता है। ये खिलौने रिटेल में नहीं बेचते। एजेंसियों के जरिए बेचते हैं। क्रिसमस पर ईसा मसीह और सांता क्लॉज की एक लाख मूर्तियों की मांग रहती है। कुल्लर हैंडीक्राफ्ट आर्टिसन वेलफेयर एसोसिएशन ने भी अपने मिट्टी के खिलौनों के लिए भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग के लिए आवेदन किया है। रामालिंगम ने सरकार से शिल्प ग्राम स्थापित करने का आग्रह किया जहां उत्पादन और बिक्री इकाइयां एक ही छत के नीचे काम कर सकें। उन्होंने कहा कि इससे पर्यटन को बढ़ावा देने में भी मदद मिलेगी।

देश-विदेश में बिकता है इनका सामान
20 सालों से इस व्यापार करने वाले एम सेंथिल कुमार (40) ने बताया कि मिट्टी की कलाकृतियों और मिट्टी के इकोफ्रेंडली खिलौने बनाने के लिए मशहूर इस गांव के कारीगरों का बनाया सामान देश-विदेश में बिकता है। नवरात्रि, गणेश चतुर्थी और दिवाली पर केरल, कर्नाटक, बेंगलुरू की बड़ी एजेंसियां हमारा सामान ले जाती हैं। वे इसकी अच्छी पैकिंग करके दूसरे देशों में बेचती हैं। रामनवमी पर राम की मूर्तियों की इतनी मांग आती है कि सालभर पहले हमारे पास ऑर्डर आ जाते हैं।

कई चुनौतियों का करना पड़ रहा सामना
एक अन्य ग्रामीण एस.कविता (38) ने बताया कि मिट्टी पास के टैंकों से ली जाती है। हालांकि, अब गुडिय़ा बनाने के लिए प्लास्टर ऑफ पेरिस और पेपर-मैशे जैसी सामग्रियों का उपयोग किया जा रहा है। खास बात यह है कि ये लोग रामायण में दर्ज प्रसंगों पर मूर्तियां यानी संग्रह बनाते हैं। इन मूर्तियों के माध्यम से ही उस काल का दृश्य सामने आ जाता है।
पहले की तुलना में उत्पादन लागत बढ़ गई है, लेकिन हम कीमत नहीं बढ़ा सके। कारोबार को जारी रखने के लिए हमें मुनाफे से समझौता करना होगा। थोक गुडिय़ा बाजार पूरी तरह से केरल के व्यापारियों पर निर्भर है। महामारी और चक्रवात से व्यापार को नुकसान हुआ लेकिन अब धीरे धीरे व्यापार पटरी पर आ रही है।