
International Mother Language Day
चेन्नई. हमारे यहां एक मशहूर कहावत हैं, 'कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणीÓ यानी हमारे देश भारत में हर एक किमी पर पानी का स्वाद बदल जाता है और हर चार किमी की दूरी पर वाणी यानी भाषा बदल जाती है। मातृभाषा का सम्मान यानी मां का सम्मान करना है। मातृभाषा किसी भी व्यक्ति की संस्कृति एवं संस्कार को अभिव्यक्त करने का सच्चा माध्यम है। यह व्यक्ति की सामाजिक, सांस्कृतिक व भाषाई पहचान भी है।
अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के मौके पर शुक्रवार को यहां चेन्नई में राजस्थानी समुदाय के लोगों ने कुछ ऐसी ही राय जताई। राजस्थान पत्रिका की मेजबानी में आयोजित परिचर्चा यानी चौपाल के दौरान लोगों ने अपनी मायड़ भाषा यानी राजस्थानी भाषा में अपनी भावनाएं व्यक्त की। राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और गौरवमयी परम्परा को संंजोए रखने के लिए मायड़ भाषा पर सार्थक चर्चा हुई।
राजस्थानी समुदाय के लोगों ने कहा कि विश्व में हर साल कई भाषाएं एवं बोलियां लुप्त हो रही है। हमें अपनी मातृ भाषा यानी मायड़ भाषा राजस्थानी को लुप्त होने से बचाने के लिए प्रयास करना चाहिए। इसके लिए न केवल राजस्थानी में संवाद की दरकार हैं बल्कि इसके साहित्य एवं लेखन को भी बढ़ावा देने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। लोगों ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षण होने पर सीखने की गति तीव्र होती है। प्राथमिक स्तर तक शिक्षण का माध्यम मातृभाषा में ही दिया जाना चाहिए, लेकिन इसके लिए इसे संवैधानिक मान्यता दिलाने की दिशा में भी प्रयास करने होंगे। मातृभाषा के माध्यम से व्यक्ति अपने विचारों को आसानी से रख सकता है। मातृभाषा में जो मिठास हैं, उसे हम भूल नहीं सकते।
राजस्थानी एक संपन्न भाषा
मातृभाषा वह भाषा होती है जिसे कोई भी अपने दिल के करीब समझता है। इसके जरिए भावों की अभिव्यक्ति आसानी से की जा सकती है। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि प्राथमिक स्तर तक की शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए। मातृभाषा के बिना किसी देश की संस्कृति की कल्पना भी बेमानी है। मातृभाषा हमें राष्ट्रीयता से जोड़ती है। देशप्रेम की भावना उत्प्रेरित करती है। भाषा होने की पहली शर्त हैं कि उसमें बोलियों एवं उप बोलियों की बहुलता हो। इस दृष्टि से राजस्थानी एक संपन्न भाषा है। उसके पास ढाई लाख शब्दों वाला दुुनिया का सबसे बड़ा शब्दकोश है। परिचर्चा का संयोजन राजस्थान पत्रिका चेन्नई के मुख्य उप संपादक अशोकसिंह राजपुरोहित ने किया।
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जड़ों से जुड़े रहने की जरूरत
राजस्थानी भाषा को बढ़ावा देने को लेकर राजस्थानी एसोसिएशन समेत अन्य संस्थान लगातार प्रयासरत रहे हैं। राजस्थानी को पहचान देने के लिए भी लगातार कई काम हो रहे हैं। भाषा ही हमारी पहचान है। बिना भाषा के हमारा अस्तित्व नहीं हैं। मातृभाषा को आगे बढ़ाने को लेकर विभिन्न तरह के सांस्कृतिक एवं सामाजिक आयोजन भी किए जाते हैं। यदि हम अपनी भाषा को खो देंगे तो हम अपनी पहचान भी खो देंगे। जरूरत इस बात की भी हैं कि हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें, तभी हमारी भाषा भी जिन्दा रह पाएंगी। राजस्थानी भाषा, साहित्य व संस्कृति को बचाने के लिए जन-जन को प्रयास की जरूरत है। अपने स्तर पर चाहे छोटे-छोटे प्रयास ही हो, लगातार करते रहने चाहिए इससे ही राजस्थानी भाषा की ज्ञानवान लौ सदैव आलौकित बनी रह सकेगी।
-कांतिलाल एच. संघवी, सिरोही जिले के कैलाशनगर निवासी।
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खेल गतिविधियां बनती है सहायक
हम अपने घर-परिवार में मातृभाषा का अधिकाधिक प्रयोग कर उसे बढ़ावा दे सकते हैं। विभिन्न खेल गतिविधियां भी मातृभाषा को बढ़ावा देने में सहायक बन सकती है। इसका जीता-जागता उदाहरण एजी जैन स्पोर्ट्स क्लब चेन्नई हैं, जहांं खिलाडिय़ों में अधिकांश आपसी संवाद अपनी मातृभाषा में ही किए जा रहे हैं। पधारो सा, जीमो सा, बिराजो सा की जो मिठास राजस्थानी में झलकती हैं वह अन्य भाषाओं में नहीं। आजकल जिस तरह पर्व-त्यौहारों के समय पहलेे जितना चाव नजर नहीं आता। इसकी गरिमा को बरकरार रखकर ही हम मातृभाषा के अस्तित्व को कायम रख पाएंगे।
-दलजीतसिंह ढड्ढा, जोधपुर मूल के।
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पर्व-त्यौहार से जोड़कर रखें
जाट समाज की ओर से चेन्नई में नीलकण्ठ महादेव मंदिर का निर्माण करीब डेढ़ दशक पूर्व करवाया गया था। मंदिर में विभिन्न धार्मिक-सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए हम राजस्थानी भाषा को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रहे हैं। भाषाएं हमारे आपसी रिश्ते मजबूत बनाती है। एक-दूसरे को जोडऩे का काम हमारी मातृभाषा बखूबी कर सकती है। हम अपने रीति-रिवाज, संस्कारों को एक-दूसरे से जोड़कर हम मातृभाषा को निसंदेह मजबूती देने का काम कर सकते हैं। भाषा से ही हमें सभ्यता व संस्कार मिलते हैं। हमारा पहनावा, हमारा रहन-सहन, हमारे रीति-रिवाज निसंदेह भाषाई एकता को मजबूत बनाते हैं। हमें इन पर भी ध्यान देना चाहिए।
-डालूराम बेनीवाल, नागौर जिले के खींवसर तहसील के कुड़ची निवासी।
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गांव में बसती हैं भाषा की आत्मा
गांवों में आज भी मातृभाषा के प्रति लगाव देखने को मिलता है। लेकिन जो लोग गांव से शहरों की तरफ पलायन कर गए, उन लोगों में जरूर इसमें कमी आई है। राजस्थानी अपणायत की भाषा है। मातृभाषा मां के समान ही हमारा पालन करती है। ह्रदय की मधुर भावनाओं को मातृभाषा ही पल्लवित पुष्पित करती है। अपनी मातृभाषा को सम्मान देने के साथ उससे प्रेम भी करें। मातृभाषा एवं व्यक्ति का संबंध आत्मा और शरीर के समान होता है। मातृभाषा से प्राप्त संस्कारों से ही महान व्यक्तित्व पैदा होते हैं। बिना मायड़ भाषा को जाने किसी भी व्यक्ति का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है।
-गणपतसिंह राठौड़, बाड़मेर जिले के समदड़ी तहसील के राखी गांव निवासी।
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युवा पीढ़ी को जोड़कर रखना चुनौती का काम
खासकर युवा पीढ़ी को भाषा के प्रति जागरुक करने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। नई पीढी को घर में जैसा माहौल मिलेगा वैसी ही भाषा वह सीखता है। अब अंग्रेजी एवं हिंदी का चलन अधिक हो गया है और ऐसे में राजस्थानी भाषा भी घरों से सिसकती दिखती है। नई पीढ़ी को हिंदी व अंग्रेजी जरूर सिखाइए लेकिन उन्हें मायड़ भाषा से भी जोड़कर रखिए। व्यक्ति को आत्मिक संतुष्टि मायड़ भाषा से ही प्राप्त हो सकती है। यदि अभी से हमने मायड़ भाषा पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले समय में मायड़ भाषा केवल किताब के पन्नों पर ही नजर आएगी।
-हुकमाराम गोदारा, प्रदेश उपाध्यक्ष, आदर्श जाट महासभा, तमिलनाडु।
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Published on:
21 Feb 2020 07:04 pm
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