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जिन दीक्षा तप पत्रिका आलेखन समारोह

जैन आराधना भवन में आचार्य तीर्थभद्रसूरीश्वर की निश्रा में 72 दिवसीय जिन दीक्षा तप पत्रिका आलेखन महोत्सव सकल संघ की उपस्थिति में...
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Jiksha Diksha, Charta Magazine Graphing Festival

Jiksha Diksha, Charta Magazine Graphing Festival

चेन्नई।जैन आराधना भवन में आचार्य तीर्थभद्रसूरीश्वर की निश्रा में 72 दिवसीय जिन दीक्षा तप पत्रिका आलेखन महोत्सव सकल संघ की उपस्थिति में हुआ। जावाल निवासी संघवी शंकरलाल बाबूलाल दानमल मंडारिया सोलंकी परिवार द्वारा उल्लासपूर्वक पत्रिका विमोचन शोभा यात्रा चंदनबाला भवन से बाजे गाजे साथ शुरू होकर जैन आराधना भवन पहुंची जहां सकल संघ के समक्ष पत्रिका आलेखन का विमोचन किया गया। इस अवसर पर चन्द्रप्रभु जैन नया मंदिर ट्रस्ट के प्रांगण में ट्रस्ट के सचिव किरीटकुमार जैन ने आगंतुकों का सम्मान किया।

इस मौके पर आचार्य ने प्रवचन के दौरान मैत्री भावना का महत्व समझाया। उन्होंने कहा 11 संघों का एक साथ मिलकर कार्य करना इसका अनुपम उदाहरण है। गुरुदेव ने सभी संघों के सुकृत की अनुमोदना की। आचार्य के समक्ष्ज्ञ मईलापुर संघ ने अगले चातुर्मास विनती प्रस्तुत की, साथ ही मईलापुर से केशरवाड़ी तक पैदल यात्रा संघ की विनती भी की गयी, कच्छवागड़ से थोरियारी जैन संघ के सदस्य भी इस मौके पर उपस्थित थे। बाद में सभी संघों में चातुर्मास कर रहे गुरु भगवन्तों ने अनेक उपमाओं के माध्यम से पत्रिका का महत्व बताया। 51 पत्रिका आलेखन कर गुरुदेव से आशीर्वाद लिया।

पत्रिका आलेखन में संगीत जैन आराधक मंडल ने प्रस्तुत किया। आगामी 29 सितम्बर को ऐतिहासिक वरघोड़ा, गांव सांझी-मंगल गीत एवं 30 सितम्बर को एसपीआर सिटी के टाउन हाल में राजाशाही पारणा होगा। समारोह में राजेन्द्र दुगड़, सुरेश कागरेचा, दिनेश चोपड़ा एवं विकास राठौर का विशेष सहयोग रहा। संचालन मनोज राठौड़ ने किया।

राग और द्वेष के कीच में फंसी हुई है आत्मा

कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा संयम के अभाव में मन चंचल है। आत्मा राग द्वेष के कीच में फंसी हुई है और विभिन्न योनियों की यात्रा जारी है। हम अंधे बने हुए हैं। जीवन में संयम बहुत जरूरी है। प्रकृति व आध्यात्मिक व्यवस्था संयमबद्ध है तथा सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था भी संयमबद्ध है। जिसने भी संयम का उल्लघन किया वह दुखी हुआ है।
आप सडक़ पर नियमबद्ध चलते हैं तो गिरते नहीं हैं।

आपने प्रकृति का उल्लंघन किया तो प्राकृतिक प्रकोप बढ़ गया। ऋतुएं अब समय पर नहीं आती। नट रस्सी पर बैलेंस बनाकर चलता है तो गिरता नहीं है। बैलेंस बिगड़ता है तो गिर जाता है। परमात्मा व्यक्ति की तरह नहीं सिद्धांत की तरह है।

जो उस सिद्धांत को मानकर जाग जाता है नियम व संयम के साथ एकमेव हो जाता है वह स्वयं परमात्मा हो जाता है। मनुष्य संयम के अनुकूल चलता है तो स्वयं की गहराई को पा लेता है। भय व लज्जा से यदि व्रत ग्रहण किए है ंतो वे व्रत सम्यक नहीं हैं। भोगों की उदासीनता से यदि जन्मे हैं तो वे व्रत सम्यक हैं। नैतिक आचरण से समाज प्रभावित होता है परमात्मा नहीं। कषाय का मंद होना अलग बात है और धर्म का जन्म होना अलग। पांच पाप के त्याग के साथ राग द्वेष का त्यााग भी जरूरी है तभी तो धर्म का जन्म होगा।