
यज्ञ में विनय, विवेक के साथ श्रद्धा भी जरूरी : डॉ. वसंत विजय
चेन्नई. कृष्णगिरी के पार्श्व पद्मावती शक्तिपीठ तीर्थ धाम में चल रहे श्रावण मास विशेष 29 दिवसीय भक्ति आराधना एवं यज्ञ महोत्सव के नौवें दिन यज्ञ कर्म को आत्मा का श्रेष्ठ कर्म करने वाला बताते हुए पीठाधिपति डॉ वसंत विजय ने पांच प्रकार के प्राण वायु एवं आहुति विधान की व्याख्या की। उन्होंने मन के पापों की आहुतियां देकर निवृत्त होने की सीख देते हुए कहा कि यज्ञ में विनय, विवेक के साथ श्रद्धा व उपादान भी जरूरी है। भगवान नारायण ने भी देवी मां पद्मावती का यज्ञ किया था।
उन्होंने कहा कि किसी मंदिर, तीर्थ क्षेत्र आदि में परमात्मा की प्रतिमा अथवा गुरु के समक्ष आंखें मूंद कर नहीं रहना चाहिए। जब देवी-देवता या गुरु समक्ष ही हों तो उनके समक्ष खुली आंखों से वंदन प्रार्थना करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संतों की सेवा भक्ति में यदि संत प्रसन्न हो गए तो स्वयं परमात्मा प्रसन्न होकर सुख ऐश्वर्य की वर्षा कर देते हैं। किसी भी श्रद्धावान व्यक्ति के जीवन में परमात्मा से पहले गुरु की आवाज अथवा वाणी रूप में आती है।
जैन धर्म की विशेषता बताते हुए डॉ. वसंत विजय ने कहा कि जैन धर्म वैज्ञानिक धर्म है, जो कि किसी भी कार्य को शुरू करते ही पूरा हो गया इस भाव को मानते हैं। यहां हर चीज का एंडिंग पॉइंट देखा जाता है, यही वजह है कि जैन धर्मावलंबी दुनिया भर में सर्वश्रेष्ठ एवं सबसे आगे रहते हैं। उन्होंने कहा कि कोई भी महिला हो या पुरुष दिनभर की बातचीत में अनेक झूठ बोलते हैं। झूठ झूठ ही होता है। व्यक्ति हर कला में अपने पारिवारिक गुणों से आगे बढ़ता है। उन्होंने शपथ के साथ सत्य बोलने का संस्कार ग्रहण करने की प्रेरणादाई सीख देते हुए कहा कि कोई भी एक छोटा सा अच्छा नियम हमारे जीवन का कल्याण कर सकता है। ज्ञानी अपना ही नहीं पराए का भी दर्द महसूस करते हैं, ऐसे ज्ञान वाले ही ज्ञानी महापुरुष कहलाते हैं। देवी मां पद्मावती को कलयुग की कल्पतरु बताते हुए डॉ वसंत विजय ने कहा कि कल्पतरु की साधना-आराधना हमारा कल्याण करेगी। कार्यक्रम में संगीतकार रामलाल घाणेराव, महेंद्र कुमार, विनोद आचार्य व दिनेश शर्मा आदि ने भक्तिमय प्रस्तुतियों के साथ संचालन किया।
Published on:
24 Jul 2022 07:52 pm
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