18 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बेटे-बेटी की शादी के लिए घर बेच दिया, उसी संतान ने पिता को साथ रखने से किया मना, अब बस स्टैंड ही आशियाना

बेटे-बेटी की शादी के लिए घर बेच दिया, उसी संतान ने पिता को साथ रखने से किया मना, अब बस स्टैंड ही आशियाना- एक लाचार पिता की दर्द व दुखभरी कहानी

2 min read
Google source verification
MADASAMI

MADASAMI

चेन्नई. एक पिता अपनी संतान की पढ़ाई-लिखाई, शादी-ब्याह के लिए पाई-पाई जोड़ता है। पिता के बहुत अरमान होते हैं। अपने कलेजे के टुकड़ों को वह प्यार से बड़ा करता है। ताकि वे उसके बुढ़ापे की लाठी बन सके। लेकिन जब वही संतान पिता को पहचानने तक से इन्कार कर दे और एक बूढ़े पिता को घर से बेदखल कर दें तो उस पिता पर क्या बीतती होगी।
कुछ ऐसी ही दर्द एवं दुखभरी कहानी है कि तमिलनाडु के तेनकासी इलाके के 61 साल के के. मदासामी की। अपनी बेटी और बेटे की शादी के लिए उधार लिए गए पैसे को चुकाने के लिए मदासामी ने अपना घर तक बेच दिया। उसके बाद अलंगुलम तालुक के अनैयप्पापुरम गांव में बस स्टैंड ही उसका आशियाना बन गया है। मदासामी की पत्नी का पांच साल पहले निधन हो गया था और उनके दोनों बच्चे शादी के बाद अपने पति-पत्नी के साथ अन्य जगहों पर चले गए।
पानी की बोतल, टिफिन व कपड़े ही मेरा सामान
मदासामी ने कहा, कुछ पानी की बोतलें, कपड़े और एक टिफिन बॉक्स बस यही अब मेरा सामान है। मैं मुख्य रूप से अपने खर्चों को पूरा करने के लिए खेत पर काम करता हूं। जिन दिनों मेरे पास काम नहीं होता है, मैं भोजन के लिए भीख मांगने को मजबूर हूं। अपनी पीड़ा बताते हुए मदासामी ने कहा, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरोगा ) के तहत मैं काम पर नहीं जा सकता हूं क्योंकि मेरे पास बैंक खाता खोलने और इस योजना में शामिल होने के लिए आवश्यक अन्य दस्तावेज प्राप्त करने के लिए एक वैध पता नहीं है। घर नहीं होने के कारण मैं वृद्धावस्था पेंशन के लिए आवेदन भी नहीं कर सकता हूं।
बच्चों की खातिर चुकाया कर्ज
मदासामी ने कहा कि मैंने अपने बच्चों की मदद से कर्ज चुकाने के बारे में सोचा था लेकिन मेरी सांतान ने मेरी कोई मदद नहीं की। बुढ़ापे में मुझे अकेला छोड़ दिया। मेरी पत्नी की मृत्यु ने मुझे शारीरिक और आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया। इस बीच बकाया ऋण लाखों में बढ़ गया और मेरे पास अपना घर बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
नए कपड़े पहनकर भीख भी नहीं मांग सकता
वे भावुक होते हुए कहते हैं, एक समय ऐसा भी था जब मैं अपने इलाके में बहुत लोकप्रिय था। शादी का समारोह हो या अंतिम संस्कार। मैं संबंधित निवासियों की मदद के लिए वहां जाने वाला पहला व्यक्ति होता था। लोग पोंगल त्योहार के दौरान मंच पर गाए जाने वाले गीतों को पसंद करते थे। मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा और मुझे इस बस स्टैंड में शरण लेने को मजबूर होना पड़ेगा। कुछ लोगों ने मुझे नए कपड़े के सेट दिए हैं लेकिन मैं उन्हें नहीं पहन सकता क्योंकि मैं नए कपड़े पहनकर भीख नहीं मांग सकता।