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मुनि तीर्थ रतिविजय गणि पंन्यास पदवी से होंगे सुशोभित

मुनि तीर्थ रतिविजय ने कहा कि संघ व शासन की एक जिम्मेदारी दे रहे हैं। गुरु भगवंत के आशीर्वाद व संघ की शुभकामना से इस जिम्मेदारी का निर्वाह कर पाउं ऐसी अपेक्षा है।

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मुनि तीर्थ रतिविजय गणि पंन्यास पदवी से होंगे सुशोभित

मुनि तीर्थ रतिविजय गणि पंन्यास पदवी से होंगे सुशोभित

चेन्नई. किलपॉक श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ के तत्वावधान व आचार्य तीर्थ भद्रसूरिश्वर की निश्रा में 1 फरवरी को गणि पंन्यास पदवी, ऐतिहासिक 10 दीक्षाएं व 8 फरवरी को परमात्मा मुनिसुव्रत स्वामी जिनालय की अंजनशलाका प्रतिष्ठा होगी। आचार्य अपने प्रधान शिष्य मुनि तीर्थ रतिविजय को गणि पंन्यास पदवी से सुशोभित करेंगे। आचार्य तीर्थ भद्रसूरिश्वर ने बताया कि दीक्षा पर्याय कम से कम 16 वर्ष बाद योग्य शिष्य को पंन्यास पद दिया जाता है।

जिन्होंने आगमों का प्राथमिक अभ्यास किया हो वे ही पंन्यास पद के अधिकारी बनते हैं। यह पदवी मुनि और उपाध्याय के बीच दी जाती है। यह पदवी मुनि तीर्थ रतिविजय को गच्छाधिपति कलाप्रभ सूरिश्वर के आदेश से दी जा रही है। पंन्यास से योग्यता के आधार पर उपाध्याय पद दिया जाता है। उन्होंने कहा कि पंन्यास पद का अर्थ है पंडित पद। उनमें गच्छ के साधु साध्वियों की सार संभाल करने की क्षमता होनी चाहिए।

पंन्यास पदवी ग्रहण करने वाले मुनि तीर्थ रतिविजय ने कहा कि संघ व शासन की एक जिम्मेदारी दे रहे हैं। गुरु भगवंत के आशीर्वाद व संघ की शुभकामना से इस जिम्मेदारी का निर्वाह कर पाउं ऐसी अपेक्षा है। यह पद गुण वैभव की सामर्थ्यता अनुसार दिया जाता है। योग्यता गुरु भगवंत ही तय करते हैं। उन्होंने कहा कि पद एक ऐसी चीज है जो मांगने से नहीं मिलती है। जो मांगने से मिलती है उसकी गरिमा नहीं होती। गणि पंन्यास प्रतिष्ठा व बड़ी दीक्षा करवा सकते हैं। जब यह पद मिलता है गुरु भगवंत मंत्र साधना देते हैं जो आजीवन करनी होती है। मंत्र साधना परमात्मा की परम्परा से मिली होती है।

पहले गुरु भगवंत के पास पहुंचती है इसके बाद वे अब मुझे दे रहे हैं। मुनि तीर्थ रतिविजय ने 1996 में दीक्षा ली। उनके पिता मुनि तीर्थ ऋषिविजय ने अपने पुत्र महाराज से प्रेरणा पाकर आचार्य के पास 12 वर्ष पहले दीक्षा ली। माता ने प्रेम व स्नेह की भावना का त्याग कर दोनों को दीक्षा की इजाजत दी। मनि ने कहा जिनशासन ही ऐसा है जिसमें मोह छोड़कर जिनशासन के सुपुर्द करते हैं। मुनि तीर्थ रतिविजय गणि पंन्यास की पदवी लेने से पूर्व परमात्मा की आज्ञा के अनुरूप भगवती सूत्र का पांचवे अंग की साधना कर रहे हैं जो 6 महिने 8 दिन की होती है।