
Old Rar, growing crack!
चेन्नई।आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) के संगठन स्तर पर दरार फैलती जा रही है। एक बिखराव उस वक्त हुआ था जब मुख्यमंत्री रहे ओ. पन्नीरसेल्वम से त्यागपत्र लेकर वी. के. शशिकला ने सूबे की मुख्यमंत्री बनने की कोशिश की थी। उनके जेल जाने के बाद मौजूदा मुख्यमंत्री ईके पलनीस्वामी (ईपीएस) ने कमान संभाली। पार्टी और सत्ता दोनों उनके हाथ में रही। पार्टी नेतृत्व में कोंगु रीजन के नेताओं का दबदबा बढ़ा। उनके प्रयासों से ओ. पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) का गुट फिर से एआईएडीएमके से जुड़ा। २१ अगस्त २०१७ को यह विलय हुआ। आने वाली अगस्त में इस विलय के दो साल हो जाएंगे। लेकिन इस अवधि में लाख लीपापोती की कोशिश हो लेकिन पार्टी स्तर पर आंतरिक विरोध नजर आया।
उदाहरण के तौर पर लोकसभा चुनाव के वक्त एआईएडीएमके ने २० टिकट पर उम्मीदवार उतारे। ओपीएस के पुत्र रविन्द्रनाथ कुमार और उनके समर्थक व पूर्व मंत्री केपी मुन्नुसामी को ही टिकट मिला। बाकी १२ सांसद जो उनके साथ आए थे खुद को ठगा सा महसूस करने लगे। शुरुआत में पार्टी पोस्टर और एक कार्यक्रम में ओपीएस को न्यौता नहीं देने का मामला भी गरमाया।
लोकसभा चुनाव के नतीजे के बाद भाजपा कैबिनेट में मंत्री पद को लेकर शोर-शराबा हुआ। ओपीएस अपने बेटे को मंत्री बनाने की हसरत पाले थे। तो राज्यसभा सांसद आर. वैद्यलिंगम ने अपने नेता ईपीएस पर मंत्री पद के लिए दबाव बनाया। बहरहाल, दोनों गुटों के हाथ कुछ नहीं लगा। दोनों गुटों में रार की दरार को विस्तार देने का कार्य मदुरै वेस्ट के विधायक व ओपीएस के समर्थक नेता राजन चेलप्पा ने शनिवार को कर दिया। पार्टी में ओपीएस संयोजक और ईपीएस सह-संयोजक हैं। किसी भी तरह के निर्णय में इनका एकमत होना आवश्यक है। जबकि सूबे की बागडोर ईपीएस के हाथ में है। ऐसे में ओपीएस खेमा स्वयं को ‘बिना दांतों’ का महसूस करता है। इसी वजह से चेलप्पा बोले कि पार्टी नेतृत्व एक के हाथ में ही होना चाहिए। उनका संकेत स्पष्ट था कि पार्टीगत सभी निर्णय के अधिकार ओपीएस को मिले।
ईपीएस-ओपीएस के बीच भी सबकुछ सामान्य नहीं कहा जा सकता। कुछ दिनों पहले यह चर्चा थी कि ओपीएस ने भाजपा नेतृत्व से दिल्ली में भेंट की। उनके भाजपा में शामिल होने की खबरें भी चर्चा में रही। दोनों नेताओं के एकसाथ होने की प्रमुख वजह एएमएमके नेता और पार्टी से बर्खास्त टीटीवी दिनकरण हैं। चाहे आपस में कितने भी मतभेद हों पर ईपीएस-ओपीएस भली-भांति समझते हैं कि अगर दो बिल्लियों की लड़ाई में फायदा कहीं बंदर को नहीं हो जाए।
इसलिए वे वैचारिक मतभेद पर नहीं आ रहे और न ही सार्वजनिक मंच से ऐसी कोई प्रतिक्रिया दे रहे जिससे दोनों के बीच के रिश्ते में खटास जैसी बात सामने आए। अब राजन चेलप्पा की प्रतिक्रिया और सीएम के शांतिपूर्ण तरीके से उससे किनारे कर जाने से लग रहा है कि वे इस मामले को तूल नहीं देना चाहते। दूसरी ओर इसे सीएम पर दबाव के तौर पर भी देखा जा रहा है कि वे रविन्द्रनाथ कुमार को मंत्री पद दिलाने के मार्ग में पैदा की जा रही रुकावटों को दूर करें। अगर शीर्ष नेताओं में आपसी समझौता नहीं हो पाता है तो शायद पार्टी का वही हश्र होगा जो शशिकला के बागडोर संभालने के वक्त हुआ था।
Published on:
09 Jun 2019 11:00 pm
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