
PM Modi : प्रकृति के प्रति हम अपना उत्तरदायित्व समझें : पीएम मोदी
“प्रकृति हमें सिर्फ प्रदान करती है। इसलिए हमें प्रकृति के प्रति भी अपना उत्तरदायित्व समझना चाहिए। धरती मां की सुरक्षा और देखभाल हमारा मौलिक दायित्व है। आज "जलवायु परिवर्तन" के रूप में प्रकृति ने अपनी कार्रवाई करनी शुरू कर दी है क्योंकि इस कर्तव्य की बहुत लंबे समय से लोगों द्वारा उपेक्षा की जा रही है।" यह कहना था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जो शुक्रवार को यहां आयोजित जी20 पर्यावरण और जलवायु स्थिरता मंत्रिस्तरीय बैठक में वर्चुअल संबोधन दे रहे थे।
प्रधानमंत्री ने संस्कृति की उक्ति का संदर्भ देते हुए कहा, “न तो नदियां अपना जल स्वयं ग्रहण करती हैं और न ही वृक्ष अपने फल स्वयं खाते हैं। बादल भी अपने जल से उत्पन्न होने वाले अन्न को नहीं खाते।” प्रकृति हमें सिर्फ प्रदान करती है। इसलिए हमें प्रकृति के प्रति भी अपना उत्तरदायित्व समझना चाहिए। धरती मां की सुरक्षा और देखभाल हमारा मौलिक दायित्व है।
अंत्योदय का पालन
मोदी ने चिंता व्यक्त की कि आज "जलवायु परिवर्तन" के रूप में प्रकृति ने अपनी कार्रवाई करनी शुरू कर दी है क्योंकि इस कर्तव्य की बहुत लंबे समय से लोगों द्वारा उपेक्षा की जा रही है। वे इस बात पर जोर देना चाहेंगे कि जलवायु कार्रवाई (एक्शन) के लिए "अंत्योदय" का पालन करना चाहिए यानी समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान और विकास को सुनिश्चित करना होगा। विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के देश जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय मुद्दों से प्रभावित हैं। हमें "संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन" और "पेरिस समझौते" के अंतर्गत निर्धारित प्रतिबद्धताओं के अनुरूप कार्रवाई की आवश्यकता है।
नवकरणीय ऊर्जा मामले में टॉप पांच देशों में
पीएम ने दावा किया कि भारत ने 2030 के लिए निर्धारित लक्ष्य से नौ वर्ष पूर्व ही गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से अपनी स्थापित विद्युत क्षमता प्राप्त कर ली है। आज स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष 5 देशों में से एक है। हमने 2070 तक कार्बन उत्सर्जन का "नेट ज़ीरो" स्तर प्राप्त करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया है। उन्होंने जी20 से आह्वान किया कि प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करने के लिए एक प्रभावी अंतरराष्ट्रीय कानून पर कार्य किया जाए जो सभी देशों के लिए बाध्यकारी हो।
महाबलीपुरम जाएं, तिरुकुरल का उल्लेख
पीएम ने संबोधन की शुरुआत में ही पीएम ने बैठक में शामिल प्रतिनिधियों से महाबलीपुरम भ्रमण का आग्रह किया। उन्होंने तिरुकुरल का उल्लेख करते हुए कहा कि महान संत तिरुवल्लुवर का कथन है- “नेडुंकडलुम तन्नीर मै कुंडृम तडिन्तेडिली तान नल्गा तागि विडिन। इसका अभिप्राय है, यदि मेघ धरा से ग्रहण किए गए जल को बारिश के रूप में लौटाते नहीं है तो महासागर भी सूख जाएंगे।" भारत में प्रकृति और उसकी व्यवस्था से हमें यह निरंतर सीख मिलती है। इनका उल्लेख कई धर्मग्रंथों के साथ-साथ मौखिक परंपराओं में भी मिलता है।
Published on:
28 Jul 2023 03:48 pm
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