भगवान राम ने चौदह वर्ष का वनवास काटा था। सेलम-बेंगलूरु राजमार्ग पर इंटनेशनल सोसायटी फॉर कृष्णा कॉन्सियशसनेस (इस्कॉन) का मंदिर करीब इतने सालों से निर्माणाधीन है जो २०२४ के अंत तक भक्तों के लिए खुल जाएगा। तमिलनाडु का प्रत्येक मंदिर विशिष्टता की विशेष परिभाषा है। इसमें इस्कॉन का यह मंदिर नए युग का देवालय होगा जिसकी दीवारों पर शिलालेख के बजाय क्यूआर कोड होंगे।
बैंकर से मंदिर के भक्त बने और वर्तमान में इसका कार्यभार संभालने वाले श्रीराम चरणारविन्द दास सामाजिक कार्यकर्ता अशोक जैन के साथ राजस्थान पत्रिका कार्यालय में आए और इस मंदिर के निर्माण और अवधारणा को लेकर अनुभव साझा किए।
२००८ से बन रहा मंदिर
मंदिर निर्माण का कार्य २००८ में शुरू हुआ जो ७० प्रतिशत पूरा हो चुका है। मंदिर के गुम्बद की पताका को शामिल करते हुए इसकी ऊंचाई ११७ फुट की है। पांच एकड़ के क्षेत्र में निर्माणाधीन इस मंदिर में पत्थरों का उपयोग हो रहा है जो श्रीरंगम मंदिर के समकक्ष है। गर्भगृह में भगवान राधाकृष्ण की मकराना की है। मंदिर के शिखर पर लगने वाले पत्थर का वजन ८० टन है। चार परिक्रमा पथों वाले इस मंदिर का हर गलियारा सनातन जीवन की विशेषताओं को प्रकट करने वाला होगा जिनमें श्रीकृष्ण अवतार, लीलाएं और श्रीमद्भागवत पुराण के १८ हजार श्लोकों का वर्णन होगा।
नई प्रौद्योगिकी का उपयोग
श्रीराम चरणारविन्द दास बताते हैं कि मंदिर निर्माण में नई प्रौद्योगिकी को स्थान दिया गया है जहां दीवारें बोलेंगी। हमारा उद्देश्य यह है कि आज से सालों बाद कोई भी व्यक्ति इस मंदिर के दर्शन करने आए तो इसके बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त कर सके। इसके लिए मंदिरों की दीवारों पर क्यूआर कोड लगाए जाएंगे जिसे स्कैन कर भक्तगण भगवान कृष्ण के जीवन और मंदिर के बारे में सभी सूचनाएं प्राप्त कर सकेंगे। सबसे अनूठा कार्य महिमा का लिखित और दृश्य वर्णन है जो गलियारे में उपलब्ध होगा।

मंदिर की आत्मनिर्भरता
वे बताते हैं कि मंदिर की भव्यता और इसके स्थायित्व के लिहाज से इस्कॉन सेलम को आत्मनिर्भर परिसर बनाने की योजना है। इसके लिए हमने देश के २० बड़े मंदिरों का अध्ययन किया। वर्तमान में मंदिर के आस-पास १२० परिवार हैं जिनमें देश-विदेश के लोग शामिल हैं। अगले दशक में यहां की बसावट करीब एक हजार परिवार तक पहुंच जाएगी। मंदिर में गुरुकुल, गौ शाला, कृषि व विपणन सहित अन्य कार्य होंगे जो इसकी आत्मनिर्भरता को बनाए रखेंगे। इस्कॉन समरसता की सोच को लेकर आगे बढ़ रहा जहां ‘ब्राह्मण स्वभावÓ रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जगह होगी। मंदिर में जाति, कुल व धर्म किसी तरह का भेद नहीं रखा जाएगा।