
Sri Nootraiappar Temple, Poonjai
चेन्नई.नागपट्टिनम जिले के पंूजै में भगवान शिव का नट्रूनैअप्पर मंदिर स्थित है। यह मंदिर शैव संतों के भक्ति काव्य थेवारम में वर्णित है और इसे पाडल पेट्र स्थलम का दर्जा प्राप्त है। उस दृष्टि यह १०६वां शिवालय है। थेवारम के अनुसार कावेरी नदी के दक्षिणी तट का यह ४३वां शिवालय है। शैव संत तिरुज्ञानसंबंदर ने इस मंदिर और यहां प्रतिष्ठित भगवान नट्रूनैअप्पर की महिमा का वर्णन किया है।
इतिहास और संरचना
नट्रूनैअप्पर मंदिर पूंजै में है जिसका पुरातन नाम तिरुनानपाली था। यह मंदिर करीब दो हजार साल पुराना है। मंदिर अन्य शिवालयों की तुलना में छोटा है लेकिन यहां कई मूर्तियां हैं। हालांकि मंदिर का परिसर बड़ा है। मंदिर में देवी पार्वती पर्वतराज पुत्री और मलयानमडंदै के रूप में विराजित हैं। मंदिर का मूल वृक्ष षणबगम और पिन्नै है तथा तीर्थकुण्ड स्वर्ण तीर्थ है। मंदिर का गर्भगृह और मण्डप प्राचीनकालीन स्थापत्य व शिल्प के अद्भुत उदाहरण है। गर्भगृह इतना बड़ा है कि एक हाथी भी इसमें खड़ा रह सकता है। मंदिर की खूबसूरती नानीपाली ध्वजाकार की वजह से है। परिसर में दक्षिणामूर्ति की बड़ी मूर्ति है। भगवान सुब्रमण्यम, प्रजापिता ब्रह्मा, लिंगोद्भव व चंडीकेश्वर की मूर्तियां भी हैं। राजराजा चोल के पूर्ववर्ती वंशज परांतक चोल ने यहां शिवलिंग की स्थापना करा मंदिर बनाया था।
विशेष आकर्षण
नट्रूनैअप्पर भगवान का शिवलिंग स्वयंभू है। तमिल महीने चित्तिरै (अपे्रल) की सप्तमी से त्रयोदशी तक भगवान सूर्य की किरणें सीधे शिवलिंग पर पड़ती है। माना जाता है कि भगवान भास्कर भोलेनाथ की आराधना कर रहे हैं। भक्तगण मंदिर स्थित भगवान कल्याण सुंदरेश्वर से विवाह और नट्रूनैअप्पर से शिक्षा और समृद्धि की मनोकामना करते हैं। मंदिर के गर्भगृह में हाथी भी समा कर भगवान शिव की पूजा कर सकता है। मंदिर की विशेषता दो देवियों से है। भगवान शिव ने अपने वैवाहिक स्वरूप में यहां विघ्नहर्ता गणेश व अगस्त्य मुनि को दर्शन दिए थे। भगवान कल्याणसुंदरर देवी अम्बिका के साथ विराजे हैं।
पौराणिक कथा
जातक कथा के अनुसार यहां कावेरी का प्रवाह पूर्व की बजाय पश्चिम की तरफ है। इसे बसवमंगिनी कहा गया है। अगस्त्य मुनि का कमंडल गिराने की वजह से भगवान गणेश को शाप लगा था। गणेश मंदिर के तीर्थ में नहाकर शापमुक्त हुए। इस क्षेत्र को पहले पोन सेई कहा जाता था जो कालांतर में पूंजै हो गया। देवी दुर्गा जो शिव मंदिरों में भैंस पर सवार होती है इस मंदिर में हरिण और शेर के साथ शूम्ब और निशूम्ब दानवों का संहार करती दर्शन देती है। शैव संत तिरुज्ञानसंबंदर की मां भगवती अम्मयार की यह जन्मस्थली है। तिरुज्ञानसंबंदर ने मंदिर के काव्य सौष्ठव का गान अपने पिता शिवपद हृदयर के कंधों पर बैठकर किया था।
Published on:
11 Mar 2018 05:22 pm
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