
बक्स्वाहा के जंगलों की कटाई का मुद्दा
छतरपुर। जिले के हीरा क्षेत्र बक्स्वाहा में हीरा उत्खनन के लिए लाखों पेड़ों के काटे जाने का मामला पिछले दिनों देश की सबसे बड़ी अदालत में पंजीकृत हुआ है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में ग्रीष्मकालीन अवकाश चलने के कारण फिलहाल इस सूचीबद्ध नहीं किया गया है। जैसे ही अवकाश खत्म होगा इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो सकती है। दिल्ली की पर्यावरण कार्यकर्ता नेहा सिंह ने इस मामले को जनहित याचिका के रूप में सुप्रीम कोर्ट में पंजीकृत कराया है। सोशल मीडिया पर चलाई जा रही बक्स्वाहा के जंगलों को बचाने की यह मुहिम सरकारी आंकड़ों के अभाव में अंदाजे के साथ दौड़ रही है। पर्यावरण कार्यकर्ता नेहा सिंह बताती हैं कि बक्स्वाहा में वन विभाग द्वारा उत्खनन क्षेत्र की सर्वे रिपोर्ट जो केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय को सौंपी गई है उसमें 4 लाख से अधिक पेड़ काटे जाने का जिक्र था बाद में इसे 2 लाख 15 हजार कर दिया गया। हालांकि डीएफओ अनुराग कुमार ने मीडिया को दिए बयान में लगभग एक लाख पेड़ काटे जाने की बात कही है। कुल मिलाकर इस मामले में वन विभाग की सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होने के कारण फिलहाल कितने पेड़ काटे जाने हैं यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है।
मौके पर नहीं गिनती के सबूत
वन विभाग ने काटे जाने वाले पेडों की गिनती नमूनों के आधार पर करने की बात कही है, लेकिन खदान वाले एरिया इमली घाट में पेड़ों की गिनती के कोई सबूत नहीं है। इतना ही नहीं इस इलाके में रहने वाले जंगली जानवरों के बारे में भी वन विभाग ने तस्वीर साफ नहीं की है। पेड़ों की संख्या कभी 4 लाख तो कभी 2.15 तो कभी 1 लाख बताई जा रही है। ऐसे में वास्तिवक रुप से कितने पेड़ हीरा खदान के लिए काटे जाएंगे, इसकी तस्वीर साफ नहीं हुई है।
युवाओं ने कहा हीरों से पन्ना का कितना विकास हो गया
इस मुद्दे पर सरकार के निर्णय का विरोध करने वाले युवाओं ने कहा कि बक्स्वाहा के जंगल नहीं कटने देंगे। दीपेश जैन कहते हैं कि बक्स्वाहा में 400 लोगों को रोजगार देने की बात कही जा रही है जबकि वर्तमान जंगल फिलहाल हजारों लोगों को रोजगार दे रहे हैं। आकाश तिवारी कहते हैं कि हीरों के नाम पर विकास के सपने दिखाए जा रहे हैं। उन्होंने सवाल पूछा कि प्रदेश के पन्ना जिले में वर्षों पहले से हीरे निकाले जा रहे हैं लेकिन आज भी पन्ना बुन्देलखण्ड के सर्वाधिक पिछड़े जिलों में शुमार है। रामकिशोर अहिरवार कहते हैं कि भाजपा विधायक ने हमें अज्ञानी कहा है हम मानते हैं कि हमने उनको चुनकर अज्ञानता की है। आशिक मंसूरी कहते हैं कि फिलहाल बक्स्वाहा क्षेत्र में भूजल स्तर काफी नीचे जा चुका है। इस परियोजना से हालात और बिगड़ेंगे। लट्टू विश्वकर्मा कहते हैं कि जंगलों को बचाने के लिए हमें सिर्फ सोशल मीडिया पर ही मुहिम नहीं चलानी है। निर्णायक तौर पर मैदान में आना पड़ेगा।
ये है पूरा मामला
उल्लेखनीय है कि मप्र सरकार ने वर्ष 2000 से लेकर 2005 के बीच छतरपुर जिले में हीरे की खदानों की जांच कराई थी। इस जांच में पाया गया था कि बक्स्वाहा क्षेत्र में जैम क्वालिटी का 3.42 कैरेट हीरा मौजूद है जिसकी कीमत हजारों करोड़ में है। इस क्षेत्र में 382.131 हेक्टेयर हिस्सा खोदकर हीरे निकाले जाने के लिए मप्र सरकार का खनिज विभाग बिरला समूह के एस्सेल माइनिंग कॉर्पोरेशन के साथ डील कर चुका है। अब मप्र के वन विभाग ने इस क्षेत्र में होने वाले पर्यावरण नुकसान के संबंध में सर्वे रिपोर्ट बनाकर केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भेजी है। यदि केन्द्रीय स्वीकृति मिलती है तो इस क्षेत्र से हीरा उत्खनन के लिए बिरला गु्रप को 50 साल की लीज मिल जाएगी। अनुमान है कि यहां से 60 हजार करोड़ रूपए के हीरे निकाले जाएंगे। जिसका बड़ा हिस्सा रॉयल्टी के रूप में मप्र सरकार को मिलेगा तो वहीं छतरपुर जिले को भी रोजगार और रॉयल्टी के रूप में काफी फायदा हो सकता है। फिलहाल स्वीकृति के लिए यह मामला केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में अटका हुआ है।
Published on:
24 May 2021 07:07 pm
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