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बुंदेलखंड की अनोखी परंपरा: दशहरे पर पान खिलाकर लोग कहते हैं ‘राम राम’

हर राज्य और प्रांत में दशहरा अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार मनाया जाता है, लेकिन बुंदेलखंड में इस दिन एक-दूसरे को पान खिलाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।

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पान

बुंदेलखंड में दशहरे के दिन एक अलग और अनोखी परंपरा देखने को मिलती है। हर राज्य और प्रांत में दशहरा अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार मनाया जाता है, लेकिन बुंदेलखंड में इस दिन एक-दूसरे को पान खिलाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। रावण दहन के साथ-साथ पान की दुकानों पर भीड़ लग जाती है और लोग खुशियों के इस दिन में एक-दूसरे को पान खिलाकर शुभकामनाएं देते हैं।

पान की दुकानों पर दशहरे के दिन विशेष तैयारी होती है। बच्चों के लिए मीठा पान, चॉकलेट पान, ऑरेंज पान और मैंगो पान तैयार किए जाते हैं। पान की दुकानदार मनीष कुशवाहा बताते हैं कि यह परंपरा आपसी सौहाद्र्र और भाईचारे का प्रतीक है। बच्चे अपने बड़ों का आशीर्वाद लेने के साथ पान खाकर संकल्प लेते हैं कि वे परिवार और देश का मान बढ़ाएंगे और एक अच्छे नागरिक बनेंगे।

इस परंपरा की जड़ें आल्हा के जमाने तक जाती हैं। पीके पटेरिया बताते हैं कि यह परंपरा महोबा से शुरू हुई थी। उस समय योद्धाओं को संकल्प के साथ एक बीरा (पान का विशेष पत्ता) उठाना पड़ता था। यही परंपरा बाद में ‘बीड़ा उठाना’ मुहावरे के रूप में प्रचलित हुई।

दस साल में घट गया उत्पादन

हालांकि बदलती पीढ़ी और आधुनिक जीवनशैली के कारण पान के प्रति रुचि कम हो गई है। स्थानीय मांग घटने के कारण किसानों ने उत्पादन भी कम कर दिया। पिछले आठ से दस साल में छतरपुर में बरेजों की संख्या एक हजार से घटकर मात्र 45 रह गई है। इनमें से अधिकांश पान लखनऊ, कानपुर, पाकिस्तान और बांग्लादेश भेजा जाता है। गढ़ीमलहरा, महाराजपुर, पिपट, नागर, बारीगढ़ और लवकुशनगर में अब भी बरेजा मौजूद हैं।

किसान देसी की जगह बंगाली पान पसंद कर रहे अब

किसान अब बंगाली पान की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि यह देसी पान की तुलना में टिकाऊ और जल्दी खराब न होने वाला है। पान की गुमटी संचालक पिंटू के अनुसार, देसी पान महंगा हो गया है और जल्दी खराब हो जाता है। इस कारण मीठी पत्ती, बंगाली और कपूरी पान का उपयोग बढ़ गया है। देशी पान का एक पत्ता अब 2.5 रुपए में बिकता है, लेकिन इसकी उपलब्धता बहुत कम है। उद्यानिकी विभाग के अनुसार, जिले में अब केवल 200 किसान ही पान की खेती कर रहे हैं।

पान की खेती में लागत भी बहुत अधिक है। प्रगतिशील किसान चितरंजन चौरसिया बताते हैं कि एक बरेजे को तैयार करने में लाखों रुपए खर्च होते हैं और हर पान की पारी पर 9-10 हजार रुपए की लागत आती है। किसान संजय चौरसिया ने बताया कि पहले कभी-कभार सरकार की ओर से मदद मिलती थी, लेकिन अब वह भी समाप्त हो गई है।

1707 से हो रही पान की खेती

1707 में महाराज छत्रसाल ने महराजपुर नगर की स्थापना के समय पान की खेती को रोजगार का जरिया बनाया। इसके लिए महोबा के अनुभवी पान किसानों की मदद ली गई और यह परंपरा पन्ना, दमोह, सागर और टीकमगढ़ तक फैल गई। बुंदेलखंड की दशहरे पर पान खिलाने की यह परंपरा न केवल सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि भाईचारे, सम्मान और सामुदायिक समरसता का प्रतीक भी बनी हुई है।

डॉ. कमलेश अहिरवार का मानना है कि यदि पान की खेती और परंपरा को आधुनिक तकनीक और सरकारी सहयोग के साथ बढ़ावा दिया जाए, तो यह बुंदेलखंड के किसानों के लिए आर्थिक रूप से लाभदायक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी गर्व का विषय बन सकती है।

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