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एमपी में फैली ‘ऑस्ट्रेलिया’ की गंभीर बीमारी, शरीर के 2 हिस्सों में हो रहा संक्रमण

Mp news: पिछले छह महीने में तीन मरीजों में इस संक्रमण का पता चला है, जिनमें से दो व्यक्तियों के लिवर और एक महिला के जांघ में ये बीमारी हुई।

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Mp news: एमपी के छतरपुर जिले में पालतू जानवर खासकर कुत्तों से इंसानों में फैलने वाली बीमारी इचिनोकॉकस ग्रैनुलोसस (सिस्टिक इचिनोकोकोसिस) संक्रमण के मामले सामने आए हैं। पिछले छह महीने में तीन मरीजों में इस संक्रमण का पता चला है, जिनमें से दो व्यक्तियों के लिवर और एक महिला के जांघ में ये बीमारी हुई। यह पहली बार है जब जिला अस्पताल में इस गंभीर बीमारी का इलाज किया गया है। इस संक्रमण के इलाज के लिए दो ऑपरेशन डॉ. आशीष शुक्ला और एक ऑपरेशन डॉ. मनोज चौधरी द्वारा किया गया। तीनों मरीज अब स्वस्थ हैं।

इस संक्रमण के लक्षण प्रारंभ में सामान्य नहीं होते, लेकिन जब यह विकसित होता है, तो यह यकृत, फेफड़े, और मस्तिष्क में हाइडेटेड सिस्ट (गांठ) बना सकता है। जब ये सिस्ट फट जाते हैं, तो गंभीर परिणाम हो सकते हैं। हाल के आंकड़ों के अनुसार, भारत में इस संक्रमण के लगभग 2000 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें से अधिकांश मामले ग्रामीण क्षेत्रों से सामने आए हैं, जहां कुत्तों और भेड़-बकरियों की संख्या अधिक है।

इन कारणों से हो रहा संक्रमण

जब मनुष्य दूषित भोजन, पानी, या मिट्टी का सेवन करता है, कुत्तों या अन्य संक्रमित जानवरों के संपर्क से भी यह संक्रमण फैल सकता है। इचिनोकॉकस ग्रैनुलोसस के अंडे कुत्तों की आंतों में रहते हैं और उनके मल के साथ बाहर निकलते हैं।

ये है संक्रमण के लक्षण और उपचार

पेट दर्द, सांस लेने में तकलीफ और थकान जैसी समस्याएं भी बीमारी के लक्षण हो सकते हैं। यदि सिस्ट फट जाएं, तो यह गंभीर एनाफिलेक्टिक सदमा जैसी गंभीर समस्या हो सकती है। इलाज में सर्जरी और एल्बेंडाजोल जैसी दवाएं शामिल हैं। जो सिस्ट को छोटा करने या नष्ट करने में मदद करती हैं।

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बचाव के उपाय

हाथों को अच्छी तरह से धोना जरूरी है। विशेष रूप से भोजन तैयार करने से पहले और बाद में। घर में पालतू कुत्तों को कृमिनाशक दवा (एल्बेंडाजोल) देना और उनसे उचित दूरी बनाए रखना जरूरी है। छतरपुर जिले में इस संक्रमण के बढ़ते मामलों के मद्देनजर, खासकर जिन घरों में पालतू जानवर रखे जाते हैं, उन्हें 6 महीने में कृमिनाशक दवा देना जरूरी है।

अलास्का में सामने आया था पहला मामला

इस बीमारी का सबसे पहला केस 1980 में अलास्का में दर्ज किया गया था। भारत में ये बीमारी 2008 में बेंगलूरु में सामने आई थी। यह विशेष रूप से यूरेशिया, उत्तरी और पूर्वी अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में प्रचलित है।

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