
प्रोफेसर शुभा तिवारी, कुलपति, महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय
छतरपुर. प्रभावी संवाद के लिए सुनना जरूरी है । जो व्यक्ति एकाग्रचित्त सुन नहीं सकता है, वह अच्छा बोल भी नहीं सकता है, सुनने का प्रशिक्षण आवश्यक है। विचार स्पष्ट होना चाहिए, भाषा सरल होना चाहिए संवाद में चित्र कल्पना आकृति अथवा विम्ब का प्रयोग होना चाहिए। यह ध्यान रहे कि व्याकरण भाषा के लिए बनी है। इसलिए कभी व्याकरण को कभी भी मन मस्तिष्क पर हावी नहीं होने देना चाहिए भाषा को सहज रूप से सीखना चाहिए, ठीक उसी प्रकार से जैसे कि हम अपनी मातृभाषा सीखते है। एक छोटे से बच्चे को भी अपनी मातृभाषा आती है, उसे कोई व्याकरण का पाठ नहीं पढ़ाया गया है। उसने उसे सुनकर देखकर महसूस करके भाषा को आत्मसात किया है किसी भी भाषा को सीखने का यह तरीका है।
अंग्रेजी भाषा के प्रयोग में गलती हो जाने पर लज्जित महसूस न करें
सही उच्चारण, अच्छे शब्दों को सुनना चाहिए, पढऩा चाहिए और बोलना चाहिए। इस प्रकार से सीखी गयी भाषा सहज रूप से प्रभावी होती है। भाषा के प्रयोग में गलती हो जाने पर बहुत भयभीत होने अथवा अपराध बोध से ग्रस्त होने की जरूरत नहीं है। सामान्यत: लोग अंग्रेजी भाषा के प्रयोग में गलती हो जाने पर बहुत लज्जित महसूस करते है। ये सर्वथा अनावश्यक है अंग्रेजी अन्य किसी भाषा की तरह एक सामान्य भाषा है जिससे निकटता स्थापित करके मित्रता की जा सकती है । भाषा को सीखने में कुछ कारक ऐसे होते है, जो अवरोध उत्पन्न करते है । संवाद करने वालो में संवाद के अवसर न मिलना, संस्कृतियों का भिन्न होना या फिर किसी संस्था में पद की भिन्नता होना- ये कुछ सामान्य अवरोध है। हमें इन अवरोधों के प्रति जागरूक होना चाहिए ये समझने की बात है कि संवाद दोनों तरफ से होता है। दोनों ही पक्षों की सहभागिता से अच्छा संवाद हो सकता है। संवाद एक जीवित जीवंत और जैविक प्रक्रिया है इस समझना आवश्यक है।
अभ्यास से शारीरिक भाषा को सुदृण कर सकते हैं
जब हम शारीरिक भाषा पर आते है तो हमारा परिधान और शरीर का आसन सीधा और मुखर होना चाहिए, आत्मविश्वास होना चाहिए परन्तु इसकी अधिकता नहीं होनी चाहिए। हमारा मुखारबिंद प्रसन्नचित्त होना चाहिए, दो लोगों के बीच में एक आवश्यक दूरी रहनी ही चाहिए। हमारी वाणी स्पष्ट और सही गति में होनी चाहिए, हाथों की संतुलित गति होनी चाहिए, शारीरिक भाषा में उदासीन चेहरा, झुके हुए कंधे, बंद भुजाएं, नाखून चबाना, अत्यधिक आंखे झपकना, पैर ऊपर नीचे करके खड़े होना तथा दूसरी तरफ देखकर बाते करना- ये सब नकारात्मक चिन्ह कहलाते है। हम अपनी शारीरिक भाषा को प्रयास और अभ्यास से बेहतर बना सकते है। सही शारीरिक भाषा से मस्तिष्क मजबूत होता है। हमें इस ओर प्रयास करना चाहिए । लेकिन एक बात का ध्यान हमेशा रखना चाहिए की शारीरिक भाषा के आधार पर सम्पूर्ण आंकलन न कर बैठे, हमें किसी के बारे में तत्काल कोई राय पक्की नहीं कर लेनी चाहिए। ये सभी बदलने वाली प्रक्रियाएं है, निरंतर गतिमान रहती है ।
कुछ सिद्धांत, कुछ मूल्य, कुछ आदर्श होने चाहिए
जब हम शुद्रिण मानसिकता के ऊपर आते है तो सबसे महत्वपूर्ण बात आत्म चेतना की है। जो व्यक्ति स्वयं का निरिक्षण करता है, स्वयं का परिक्षण करता है, वह एक अच्छा संवादकर्ता होता है, अच्छे संवादकर्ता को मानसिक रूप से लचीला होना चाहिए। ये मानना की मैं भी गलती कर सकता हूं और मुझमें भी सुधार की गुंजाइश है, ऐसा मानना अच्छे संवाद और अच्छे व्यक्ति की पहचान है। यदि आप रोचक होना चाहते हैं, तो आपको दूसरों की गतिविधियों में दिलचस्पी रखनी चाहिए, जो व्यक्ति सिर्फ स्वयं के बारे में सोचता है। जिसका संसार स्वयं तक ही केन्द्रित है, वो सामान्यत: अच्छा वार्तालाप नहीं कर सकता, दूसरा व्यक्ति भी महत्वपूर्ण है, दूसरे व्यक्ति का जीवन क्रियाकलाप भी महत्वपूर्ण, ऐसा मानना अच्छे संवाद के लिए आवश्यक है। एक बोरिंग व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वो सब कुछ पहले से जानता है, उसके अन्दर उत्सुकता का भान नहीं है, अत्यधिक परिपवक्ता अच्छे संवाद में बाधक होती है। ह्रदय से युवा होना चाहिए। कुछ सिद्धांत, कुछ मूल्य, कुछ आदर्श हमें हमेशा साथ रखने चाहिए। एक व्यक्ति का ह्रदय से युवा होना अति आवश्यक है। उसे सीखने की चाह होनी चाहिए, उसमें सीखने की गुंजाइश होनी चाहिए। मानसिक लचीलापन अच्छे संवाद की पहली कड़ी है। एक अच्छा संवादकर्ता पूर्वाग्रह मुक्त होता है। वह भाषा, क्षेत्र, जाति, संस्थान तथा किसी समूह को लेकर पूर्वाग्रह ग्रसित नहीं होता है। जब हम मुक्त होकर किसी को सुनते है और एक गैर आलोचनात्मक रवैया अपनाते है, तब हम अच्छे संवाद के लिए तैयार हो जाते हैं, यही सकारात्मकता है। यह अति महत्वपूर्ण है कि हम स्वयं से कैसी बात करते हैं । एक मनुष्य अपने जीवन में सबसे अधिक संवाद स्वयं से करता है। उसका शरीर तथा उसका मन स्वयं संवाद को निरंतर एक नाद के रूप में सुनता रहता है और आत्मसात करता रहता है ।
अच्छे भावों को निरंतर दोहराते से वास्तविकता बन जाते हैं
यदि हम अपने मन में निरंतर पीडि़त बने रहेंगे तो वही हमारी हकीकत हो जाएगी। ये याद रखने की बात है कि स्वयं से संबंध हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पहलु है। हम जिस चीज पर ध्यान केन्द्रित करते है हम वैसे ही हो जाते है। भारत में प्राचीन विज्ञान परंपरा में मंत्र का यही स्थान है। जब हम अच्छे शब्दों को, अच्छे अर्थों को, अच्छे भावों को निरंतर दोहराते जाते हैं तो वही हमारी वास्तविकता हो जाती है। संवाद निहित जिम्मेदारी से किया जाना चाहिए । जैसे की एक शिक्षक अपने विद्यार्थी से मनोबल तोडऩे का संवाद नहीं कर सकता है। इसी प्रकार एक चिकित्सिक, एक अभियंता, एक कानूनविद हर किसी के संवाद में उसकी जिम्मेदारी निहित होती है । हमारे संवाद में निरतंरता और एकरूपता रहनी चाहिए, यदि हम स्वयं की ही कही गई बात को अपने अगले संवाद में काट देते है या उससे विपरीत बात करते हैं तो हमारी विश्ववसनीयता समाप्त हो जाती है। हम अपनी बात को बदल सकते है, लेकिन उसके पीछे कोई स्पष्ट तर्क होना चाहिए, सुनने वाले को ये पता होना चाहिए कि हम अपनी बात क्यूं बदल रहे हैं। इस प्रकार हम देख सकते है कि आदर और सम्मान मांगा नहीं जा सकता है, इसे कमाना पड़ता है।
अच्छे संवाद से अच्छे व्यक्तित्व का निर्माण
जब हमारा कहना और करना एक जैसा होता है तो विश्वसनीयता अपने आप बढ़ जाती है। स्वयं को दूसरों से बेहतर मानना अच्छे संवाद में सबसे बढ़ी बाधा है। हमें हमेशा ये मानना चाहिए कि हममें सुधार की गुंजाइश है। कोई भी व्यक्ति सम्पूर्ण नहीं होता है। हम सदैव ही एक दूसरे से सीखते रहते है। इस प्रकार हमें अपने संवाद पर निरंतर चिंतन करना चाहिए। संवाद हमारे व्यक्तित्व का एक बहुत महत्वपूर्ण आयाम है। अच्छे संवाद से अच्छे व्यक्तित्व का निर्माण होता है। जीवन के विभिन्न पहलु एक दूसरे से जुड़े हुए है। जब हम एक क्षेत्र में अच्छा करते हैं तो स्वभाविक रूप से दूसरे क्षेत्रों में भी अच्छा करने लगते है। हमारे समक्ष स्वत: ही जीवन के विभिन्न स्वरुप समझ और अंतद्र्रष्टि उपस्थित होने लगती है, रास्ते स्वयं खुलने लगते है। जीवन में उत्कृष्टता हासिल करने का यह एक सुलभ मार्ग है ।
Published on:
27 Feb 2024 04:20 pm
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