
Doctor on leave Hospital patient upset No staff
छतरपुर/बकस्वाहा। स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र इन दिनों अपनी बदहाली की मार झेल रहा है जहां मरीजों के बेड पर मरीज नहीं बल्कि कुत्ते आराम फरमा रहे हैं। आलम है कि जहां देखो वहां जानवर ही दिखाई देते है चाहे वो ओपीडी हो या मरीजों का कक्ष। लेकिन बिडम्बना की बात है कि इस ओर न तो अस्पताल प्रबंधन ध्यान दे रहा है और न ही स्वास्थ्य विभाग। यहां के कर्मचारी जब भी अधिकरियों से इस बारे में बात की जाती है तो वह एक दूसरे पर गलती करने की बोझ डाल अपने हाथ खडे कर लेते हैं। ऐसे में यहां पर आने वाले मरीजों की हालत दयनीय है। स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टरों और स्टाफ की पद स्थापना होने के बाद भी इलाज नहीं मिल पा रहा है।
बिना डॉक्टर का अस्पताल होने का हो बना रहे रिकॉर्ड
विकास खंड क्षेत्र के सवा सौ गांव और एक लाख से अधिक आबादी के इलाज की जिम्मेदारी लेने वाले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बकस्वाहा अब बिना डॉक्टर का अस्पताल होने का रिकॉर्ड बना रहा है। यहां पर सुविधाओं व डॉक्टर के अभाव में इलाज की औपचारिकता भी सही तरीके से नहीं की जा रही है। दो जून की रोटी को अथक मेहनत करने वाले ग्रामीण जब इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचते हैं तो वहां इलाज तो बहुत दूर की बात बैठने को उचित स्थान और पीने को पानी भी नसीब नहीं होता। डॉक्टर के अभाव में पदस्थ स्टाफ भी खुद को वरिष्ठ अधिकारी से कम नहीं समझते। अस्पताल की शेष समस्त व्यवस्थाएं पूर्णतया ध्वस्त दिखाई देती हैं कहीं डिस्पोज दवाओं का कचरा कहीं बीड़ी गुटखा के पाउच ही नजर आते हैं। इसके अलावा ओपीडी हो या प्रसूता कंपाउंड, एनआरसी हो या अस्पताल की गैलरी कुत्ते और जानवर आपको हर जगह देखने को मिलेंगे चाहे वो वार्ड हो या मरीजो के बेड हां यदि आपको ढूंढना ही पड़ेगा तो स्टॉप में पदस्थ लोगों को।
खाली पदों पर आए डॉक्टर और गए लंबी छट्टी
यूं तो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में महिला डॉक्टर सहित 6 डॉक्टर के पद हैं जिसमे अभी अस्थाई रूप से महज एक डॉक्टर केपी बमोरिया को प्रभारी बतौर में रखा गया है सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सिर्फ पड़ी है तो खाली कुर्सियां मरीजों को देखनी पड़ रही है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पूर्णता डॉक्टर विहीन है। स्वास्थ्य केंद्र में बीएमओ एलएल अहिरवार करीब चार माह पहले कुछ दिनों की छुट्टी लेकर गए थे जो अभी तक लैटकर नहीं गए। वहीं उनके बाद आने वाले डॉक्टर भी छुट्टी लेकर चले गए और अभी तक नहीं लौटे हैं। जिससे यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था पुरी तरह से बेपटरी हो गई।
नाम मात्र की सुविधाएं
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र होने की वजह से सुविधाओं की खानापूर्ति कागजों में भले ही दर्शाई जाती हो लेकिन वास्तविकता यही है कि यहां मौजूद एंबुलेंस भी तक किसी मरीज के उपयोग में नहीं आ रही है। आती नजर नहीं आई जननी एक्सप्रेस हो व स्वास्थ्य विभाग का वाहन जरूरत के समय मरीजों को अपनी ही व्यवस्था से आना जाना पड़ता है एक्स-रे और खून की जांच करवाने के लिए भी लोगों को जिला स्तर तक जाना पड़ता है।
आएदिन होती मरीजो की मौत
ऐसी विषम परिस्थिति में आर्थिक अभाव के बाद भी मरीज को मजबूरन या बाहर जाना पड़ता है बकस्वाहा से दमोह १४० किलोमीटर, छतरपुर 1२५ किलोमीटर और सागर १६० किलोमीटर इलाज के लिए जाना पड़ता है। ऐसे में कई बार समय से इलाज नहीं मिल पाने से तय की गई दूरी ही मरीज की मौत का कारण बन जाती है।
झोलाछाप डॉक्टरों से लुट रहे ग्रामीण
शासकीय स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टरों के न रहने से मरीजों को मजबूरन झोलाछाप डॉक्टरों का सहारा लेना पड़ रहा है। ऐसे में कई बार झोलाछाप डॉक्टरों का इलाज लोगों के लिए मौत का कारण बन जाता है। लेकिन स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टरों के नहीं रहते ऐसे में महज एक सहारा झोलाछाप डॉक्टर ही बचते है जिनके पास मजबूरी में ग्रामीणों को इलाज के लिए अपने परिजनों को ले जाना पड़ता है जबकि पूर्व में गलत इलाज के दौरान 5 साल का बच्चा दम तोड़ चुका है।
इनका कहना है
मरीजों के पलंग पर कुत्ते सो रहे हैं इस मामले की जानकारी मिली है। इसकी जांच कराई जाएगी। जांच के बाद संबधित कर्मचारी पर कार्यवाही की जाएगी।
केपी बमोरिया बीएमओ बकस्वाहा
Published on:
11 Aug 2018 01:15 pm
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