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लोक साहित्य में कार्य करने पर डॉ. शांति जैन को मिला पद्मश्री सम्मान

बुंदेलखंड गौरान्वित

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Dr. Shanti Jain received Padma Shri for working in folk literature

Dr. Shanti Jain received Padma Shri for working in folk literature

बम्होरी. केंद्र सरकार द्वारा दिया जाने वाला नागरिक सम्मान पद्मश्री बुंदेलखंड के छतरपुर जिले की बकस्वाहा में जन्में स्व. हेमराज जैन की (बिहार गौरव गान लिखने वाली) डॉ. शांति जैन को लोक साहित्य पर विशेष कार्य करने और उनकी साहित्य साधना के लिए नवाजा गया है। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शांति जैन का जन्म 4 जुलाई 1946 को हुआ था, जिन्होंने एमए (संस्कृत एवं हिंदी) पीएचडी, डी.लिट, संगीत प्रभाकर की शिक्षा प्राप्त की। बिहार प्रदेश के भोजपुर जिले के आरा नगर में स्थित एचडी जैन कॉलेज से प्रोफेसर एवं संस्कृत की विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुई हैं। वह आकाशवाणी, दूरदर्शन की कलाकार व कवियत्री हैं। आप पिछले कई दशक से पटना (बिहार) में रह रही हैं। इनके पिता स्व. हेमराज जैन नौकरी के लिए बकस्वाहा से आरा गए हुए थे।
स्वर संगम में भी माहिर: साहित्य पर पकड़ के साथ-साथ उनकी मधुर आवाज डॉ. शांति जैन की पहचान रही है। 1970 के दशक में रेडियो पर उनका गाया रामायण बेहद लोकप्रिय हुआ था। जयप्रकाश नारायण जब बेहद बीमार होकर घर पर थे तो डॉ. शांति जैन उनके घर जाकर रोज रामायण सुनाया करती थीं।
सम्मान का गौरव: डॉ. शांति जैन को वर्ष 2009 में संगीत नाटक अकादमी का राष्ट्रीय सम्मान राष्ट्रपति द्वारा मिला था, तो मध्य प्रदेश सरकार ने वर्ष 2008 में राष्ट्रीय देवी अहिल्या सम्मान दिया था। इसके अलावा केके बिड़ला फाउंडेशन द्वारा शंकर सम्मान, संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार द्वारा नेशनल सीनियर फैलोशिप सम्मान, ऑल इंडिया रेडियो का राष्ट्रीय सम्मान, चैती पुस्तक के लिए बिहार सरकार का राजभाषा सम्मान और कलाकार सम्मान सहित अनेकों सम्मान प्राप्त हुए हैं।
साहित्य साधना में योगदान
इनकी श्रेष्ठतम रचनाओं में एक वृत्त के चारों ओर, हथेली का आदमी, हथेली पर एक सितारा (काव्य), पिया की हवेली, छलकती आंखें, धूप में पानी की लकीरें, सांझ घिरे लागल, तरन्नुम, समय के स्वर, अंजुरी भर सपना (गजल) गीत संग्रह, अश्मा, चंदनबाला (प्रबंधकाव्य), चैती (पुरस्कृत), कजरी, ऋतुगीत- स्वर और स्वरूप, व्रत और त्योहार, पौराणिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, उगो है सूर्य, लोकगीतों के संदर्भ और आयाम (पुरस्कृत), बिहार के भक्तिपरक लोकगीत, व्रत त्योहार कोश, तुतली बोली के गीत (लोक साहित्य), वसंत सेना, वासवदत्ता, कादंबरी, वेणीसंहार की शास्त्रीय समीक्षा (क्लासिक्स), एक कोमल क्रांतिवीर के अंतिम दो वर्ष (डायरी) सहित कई दर्जन लोकप्रिय किताबें लिख चुकी हैं। डॉ. जैन कई संस्थानों की पदाधिकारी व सदस्य रह चुकी हैं और 75 साल की उम्र में भी वह आज भी लेखन कला में काफी सक्रिय हैं।