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जिले में दवाओं और खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता जांच के नाम पर चल रहे बड़े खेल और अफसरों की साठगांठ का मामला अब तूल पकड़ चुका है। नशीली दवाओं के बढ़ते अवैध कारोबार, अमानक सैंपलिंग और लैब रिपोर्ट में सैंपल फेल होने के बावजूद आरोपियों पर कार्रवाई न करने के मामले को प्रशासन ने बेहद गंभीरता से लिया है। खबर उजागर होने के बाद कलेक्टर मृणाल मीना और सीएमएचओ डॉ. आरपी गुप्ता ने सख्त रुख अपनाते हुए पूरे विभागीय तंत्र की जांच बैठा दी है।
कलेक्टर मृणाल मीना ने पिछले एक वर्ष के दौरान खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग द्वारा लिए गए सभी लीगल और सर्विलांस सैंपलों की बारीकी से जांच कराने के आदेश दिए हैं। इस जांच में सबसे ज्यादा ध्यान उन मामलों पर रहेगा जिनमें लैब रिपोर्ट अमानक (फेल) आई थी, लेकिन जिम्मेदार अफसरों ने आगे कोई कानूनी या अदालती कार्रवाई नहीं की।
शासकीय नियमों और विभागीय गाइडलाइन के अनुसार, ड्रग इंस्पेक्टर को हर महीने कम से कम 5 लीगल ड्रग सैंपल लेना अनिवार्य होता है। यानी पिछले 6 महीनों में ड्रग इंस्पेक्टर अजीत कुमार जैन को 30 लीगल सैंपल लेने थे, लेकिन रिकॉर्ड बताते हैं कि इस अवधि में केवल 8 सैंपल लेकर ही महज खानापूर्ति कर दी गई। सैंपलिंग में इस ढिलाई और औपचारिकता के चलते जिले में नशीले सिरप, प्रतिबंधित गोलियों और अमानक दवाओं का नेटवर्क लगातार मजबूत होता चला गया। शहरी क्षेत्रों से लेकर ग्रामीण अंचलों के मेडिकल स्टोरों पर ऐसी दवाओं की बिक्री की शिकायतें लगातार मिलती रहीं, लेकिन कार्रवाई शून्य के बराबर रही।
सैंपलिंग प्रक्रिया में घोर लापरवाही और विभागीय जांच में सामने आई गड़बडिय़ों को लेकर सीएमएचओ एवं उप संचालक (औषधि प्रशासन) डॉ. आरपी गुप्ता ने सख्त कदम उठाया है। उन्होंने ड्रग इंस्पेक्टर अजीत कुमार जैन को पूरे एक साल के सैंपलिंग रिकॉर्ड, लैब रिपोट्र्स और लंबित मामलों के ब्योरे के साथ अपने कार्यालय में तलब किया है। विभाग में अब उन अधिकारियों की सूची तैयार की जा रही है जिन्होंने लैब रिपोर्ट में दवाइयां अमानक पाए जाने के बावजूद विक्रेताओं या कंपनियों के खिलाफ कोर्ट केस दर्ज कराने में देरी की या मामला दबा दिया।
नियमित निरीक्षण- जिले के सभी मेडिकल स्टोरों और खाद्य प्रतिष्ठानों की नियमित जांच करना।
अनिवार्य सैंपलिंग- संदिग्ध या प्रतिबंधित दवाओं के लीगल सैंपल लेकर तत्काल सरकारी लैब में जांच के लिए भेजना।
समयबद्ध कार्रवाई- प्रयोगशाला परीक्षण में दवा मानक के विपरीत पाए जाने पर संबंधित विक्रेता, वितरक और निर्माता कंपनी पर तुरंत कोर्ट केस (अभियोजन) दर्ज कराना।
प्रतिबंध पर नकेल- बिना वैध अनुमति और डॉक्टर के पर्चे के बिक रही प्रतिबंधित नशीली दवाओं को जब्त कर कड़ी कानूनी कार्रवाई करना।
पारदर्शी रिकॉर्ड-निरीक्षण और सैंपलिंग का संपूर्ण रिकॉर्ड विभागीय समीक्षा हेतु सुरक्षित रखना।
जिले के सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि औषधि प्रशासन की सुस्ती और अनदेखी की वजह से ही अवैध नशीली दवाओं का काला कारोबार चरम पर पहुंचा है। युवा पीढ़ी आसानी से इन नशीली दवाओं की गिरफ्त में आ रही है। कार्रवाई करने के बजाय केवल रस्म अदायगी करने से दवा माफियाओं के हौसले बुलंद हैं।
विभाग में सैंपलिंग का निर्धारित मासिक कोटा
ड्रग इंस्पेक्टर न्यूनतम 5 लीगल सैंपल प्रति माह।
खाद्य सुरक्षा अधिकारी - न्यूनतम 5 लीगल एवं 8 सर्विलांस सैंपल प्रति माह।
ड्रग इंस्पेक्टर द्वारा लक्ष्य के अनुसार दवाओं के लीगल सैंपल न लिए जाने पर उनसे लिखित जवाब मांगा गया है। लैब में सैंपल अमानक मिलने के बाद भी कार्रवाई न करने के मामलों की समीक्षा की जा रही है। जांच रिपोर्ट तैयार कर कलेक्टर को भेजी जाएगी, जिसके आधार पर आगे की दंडात्मक कार्रवाई होगी।
डॉ. आरपी गुप्ता, उप संचालक, औषधि प्रशासन / सीएमएचओ, छतरपुर
खाद्य और दवाओं की सैंपलिंग में किसी भी स्तर पर अफसरों की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। पिछले एक साल की पूरी प्रक्रिया की जांच के आदेश दिए गए हैं। यदि किसी अधिकारी द्वारा दवा माफियाओं को संरक्षण देने या केस दर्ज न करने की बात सिद्ध होती है, तो संबंधित के खिलाफ सीधी सख्त कार्रवाई की जाएगी।
मृणाल मीना, कलेक्टर, छतरपुर
Updated on:
01 Sept 2026 11:02 am
Published on:
01 Sept 2026 11:02 am
