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जनसहयोग की मिसाल के बाद भी सिस्टम बेहाल: ग्रामीणों ने 10 लाख जुटाकर खरीदी जमीन, शासन को सौंपी, फिर भी राधेनगर-दौरिया की सड़क कागजों में दफन

सागर-कानपुर नेशनल हाइवे से इन गांवों को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग पिछले कई वर्षों से उपेक्षित पड़ा है।

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गांव की सडक़

बुंदेलखंड के विकास की बातें फाइलों में तो बहुत चमकती हैं, लेकिन धरातल पर आज भी ग्रामीण आदिम युग जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ग्राम पंचायत ललौनी के राधेनगर और दौरिया गांव से एक ऐसा मामला सामने आया है जो सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता को उजागर करता है। यहां के ग्रामीणों ने आत्मनिर्भरता की एक ऐसी मिसाल पेश की है जिसकी चर्चा पूरे जिले में है, लेकिन प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।

आत्मनिर्भरता की अनूठी पहल: जब खुद उठानी पड़ी जिम्मेदारी

सागर-कानपुर नेशनल हाइवे से इन गांवों को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग पिछले कई वर्षों से उपेक्षित पड़ा है। ग्रामीणों ने जब देखा कि प्रशासन जमीन अधिग्रहण और अन्य तकनीकी कारणों का बहाना बनाकर सड़क निर्माण को टाल रहा है, तो उन्होंने खुद मोर्चा संभाला। गांव के हर घर ने अपनी क्षमता के अनुसार चंदा दिया और करीब 10 लाख रुपए की बड़ी राशि जुटाई गई। इस राशि से सड़क के मार्ग में आ रही निजी भूमि को खरीदा गया और उस जमीन को बिना किसी शर्त के शासन को सौंप दिया गया। ग्रामीणों का उद्देश्य स्पष्ट था, प्रशासन के पास अब जमीन नहीं है कहने का कोई बहाना न बचे।

3 किलोमीटर का सफर और नारकीय पीड़ा

मुख्य हाइवे से गांव तक पहुंचने के लिए मात्र 3 किलोमीटर का फासला तय करना पड़ता है, लेकिन यह दूरी किसी लंबी और खतरनाक यात्रा जैसी महसूस होती है। पूरा रास्ता पत्थरों और गहरे गड्ढों से भरा है।

बारिश में टापू बन जाता है गांव: बारिश शुरू होते ही यह कच्चा रास्ता दलदल में तब्दील हो जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि कीचड़ इतना अधिक होता है कि बाइक तो दूर, पैदल चलना भी जान जोखिम में डालने जैसा है।

शिक्षा और स्वास्थ्य पर प्रहार: रास्ते की बदहाली का सबसे बुरा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। स्कूल बसें या अन्य वाहन गांव के भीतर नहीं आ पाते, जिससे बच्चों की शिक्षा बाधित होती है। आपातकालीन स्थिति में मरीजों को चारपाई पर लिटाकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है।

अधिकारियों के चक्कर लगाकर हारे

ग्रामीणों ने अपनी समस्या को लेकर कलेक्टर से लेकर जनपद पंचायत के चक्कर काटे हैं। उनके पास आवेदनों का ढेर लगा है, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिला। सवाल यह उठता है कि जब ग्रामीणों ने जमीन खरीदकर शासन को दे दी है, तो फिर काम शुरू करने में अड़चन कहां है?

आस-पास के इलाकों का भी यही हाल

समस्या सिर्फ राधेंनगर तक सीमित नहीं है। कतवारा से देरी मार्ग की स्थिति भी अत्यंत दयनीय है। इस मार्ग पर प्रतिदिन 100 से 200 किसान अपनी उपज लेकर निकलते हैं। रात के अंधेरे में खराब रास्तों के कारण आए दिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे बैठा है।ग्रामीणों ने अपना फर्ज निभा दिया है, अब बारी सरकार और प्रशासन की है। क्या राधेंनगर और दौरिया के लोगों को इस बार बारिश से पहले पक्की सड़क मिल पाएगी या उनकी 10 लाख की मेहनत धूल फांकती रहेगी?

जिम्मेदारों का बयान

इस गंभीर लापरवाही पर प्रधानमंत्री सड़क योजना के जीएम मोहम्मद तौफीक ने कहा है कि वह इस मामले की फाइल दिखवाएंगे। उन्होंने आश्वासन दिया है कि यदि तकनीकी रूप से स्वीकृति मिल चुकी है, तो निर्माण कार्य में हो रही देरी की जांच कर जल्द काम शुरू कराया जाएगा।

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