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सरकारी जमीनों की बंदरबाट, निजी लोगों को बना दिया मालिक

- आजादी के पहले चढ़ाया एक व्यक्ति का कब्जा,फिर 1961 में दूसरे को बना दिया मालिक- फिर धीरे-धीरे कई लोगों को बनाया हिस्सेदार और बेच दी सरकारी जमीन

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मनचला रोज करता था छेडख़ानी, परेशान होकर लड़की ने उठाया ये कदम, मिली मौत

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धर्मेंद्र सिंह छतरपुर। सरकारी जमीन को निजी स्वामित्त की बताकर बेचने का खेल छतरपुर में आजादी के पहले शुरू हुआ था। जो 7 दशक बाद भी जारी है। सरकारी जमीन को बेचने का खेल तो पूरे जिले में हुआ,लेकिन खेल का तरीका सभी जगह एक जैसी ही रहा है। पहले सरकारी जमीन पर निजी लोगों का कब्जा सरकारी रेकॉर्ड में दर्ज किया गया, वो भी किसी सक्षम अधिकारी के आदेश के बिना ही चढ़ा दिया गया। फिर सरकारी रेकॉर्ड में सरकारी जमीन पर धीरे-धीरे कई वर्षो में और लोगों के नाम चढ़ाए गए। रेकॉर्ड में दर्ज कब्जेधारी लोगों को बाद में उस जमीन का मालिक बना दिया गया। मालिक बनने के बाद इन लोगों ने सरकारी जमीन को बेचने का सिलसिला शुरू किया, जो आज भी चल रहा है। सरकारी जमीन निजी
मालिकाना की जमीन बनाकर बेचने का ये खेल छतरपुर शहर से लेकर सूदूर के कस्बे बक्स्वाहा तक खेला गया। इसके लिए राजस्व रेकॉर्ड में फजी एंट्री से लेकर दानपत्र और फर्जी वसीयत तक का सहारा लिया गया।
छतरपुर में इस तरह चरनोई की जमीन हो गई निजी :
आजादी के पहले 1939-40 में हुए बंदोबस्त के समय छतरपुर पटवारी मौजा की चरनोई के लिए आरक्षित जमीन खसरा क्रमांक 3766 कुल रकबा 13 एकड़ पर द्वारका ब्राम्हण का कब्जा चढ़ा दिया गया। फिर उसी जमीन पर 1957-58 में दूसरे व्यक्ति चन्ना काछी का नाम कब्जेदार के रुप में दर्ज कर दिया गया। इसके बाद 19६८-६९ में मलोरा तनय लटकना और पारवा वाली पत्नी चन्ना काछी को बिना किसी सक्षम अधिकारी के आदेश के जमीन का मालिक बना दिया गया। फिर इस जमीन के मालिक बनाए गए व्यक्ति के उत्तराधिकारियों को मालिक बनाया गया। इसके बाद १९८४-८५ में बिना किसी विक्रय पत्र के तीन लोगों के नाम चढ़ा दिए गए। ये तीन लोग ददन सिंह, श्रीपत सहाय और उनकी बेटी जानकी ने २००५-०६ में बसीयत और २००९-१० में दान पत्र के जरिए पूरी जमीन जानकी के नाम कर दी । वसीयत और दानपत्र के जरिए जानकी पत्नी पीडी चतुर्वेदी के नाम जमीन का मालिकाना हक लिख जाने के बाद इस जमीन को बेचने का सिलसिला शुरू हुआ। सरकारी से निजी बनाई गई 13 एकड़ जमीन में से 10 एकड़ जमीन जानकी के पति पीडी चतुर्वेदी ने वर्ष 20१३ में ४ लोगों को बेच दी। रेलवे स्टेशन के सामने की जमीन होने से इसकी कीमत करोड़ों में है। इसलिए धोखाधडी से निजी स्वामित्व की बनाई गई इस जमीन को बेचने का सिलसिला आज भी चल रहा है। अब इस जमीन की प्लॉटिंग करके कॉलोनी बनाई जा रही है।
बक्स्वाहा में सरकारी रेकॉर्ड गायब करके सरकारी को कर दिया निजी जमीन :
कीमती सरकारी जमीनों को निजी बनाकर बेचने का खेल न केवल छतरपुर शहर बल्कि बक्स्वाहा तहसील इलाके में भी खेला गया है। बक्सव्हा तहसील के मगरई पटवारी मौजा की ऐसी सरकारी जमीन, जहां खनिज भरपूर मात्रा में उपलब्ध है,उसे निजी लोगों के नाम दर्ज कर दिया गया। मगरई के खसरा नबंर १६/१ से लेकर 16/७, १५०/१, १५७/३, ४७८/१/१, ४७८/१/२, ४८०. ४८१,५७३, ५७६/२, ६११ से लेकर 615 तक, ६१६/३, ६१६/५,६१९, ६२०/१, ३२१, ३२२, १५२/३ कुल रकबा लगभग १५० एकड़ सरकारी जमीन को बिना किसी सक्षम अधिकारी के आदेश के निजी लोगों का स्वामित्त रेकॉर्ड में दर्ज कर दिया गया। ये जमीन वर्ष १९५२-५३ में मध्यप्रदेश शासन के नाम कदी,बंजर और चरनोई जमीन के रुप में दर्ज थी। वर्ष १९५४-५५ से लेकर १९६१-६२ और १९६४-६५ से लकेर १९६८-६९ का रेकॉर्ड गायब करके सरकारी जमीन को निजी लोगों की स्वामित्व की जमीन रेकॉर्ड में लेख कर दिया गया। बक्स्वाहा तहसील में वीरमपुरा, केवलारी में भी इसी तरह से सरकारी जमीन को निजी लोगों के नाम कर दिया गया। सरकारी पथरीली जमीन को निजी करने के पीछे एक बड़ी साजिश है,चूंकि इस इलाके में लोहा,डोलोमाइट समेत कई तरह के खनिज तत्व पो जाते हैं। इसलिए जमीन हथियाने का खेल किया गया।
पटवारी रेकॉर्ड में हेरफेर करके हुआ खेल :
सरकारी जमीन को निजी भूमि बनाने के लिए किसी सक्षम राजस्व अधिकारी के आदेश का इस्तेमाल नहीं किया गया, क्योंकि कोई भी अधिकारी सरकारी जमीन को निजी लोगों के नाम चढ़ाने का आदेश दे ही नहीं सकता है। सरकारी से निजी बनाने के खेल में पटवारी रेकॉर्ड में पहले सरकारी जमीन पर निजी लोगों का कब्जा चढ़ाया गया। फिर कब्जेधारी को मालिक बना दिया गया। जबकि भूराजस्व संहिता की धारा 11 के अनुसार पटवारी राजस्व अधिकारी नहीं है, न वो जमीन के नामांतरण, कब्जा और मालिकाना हक का आदेश दे सकता है। संहिता की धारा ५० के अनुसार केवल राजस्व अधिकारी ही भू-रेकॉर्ड के संबंध में प्रकरण की सुनवाई और आदेश दे सकता है। इसलिए पटवारी के द्वारा बिना किसी सक्षम अधिकारी के आदेश के रेकॉर्ड में हेराफेरी करके सरकारी जमीन का बंदरबाट किया गया।
कुछ रिकॉर्ड मिसिंग हैं
तहसील में वर्ष 2000 तक का पुराना रिकॉर्ड है, लेकिन 1954 से 62 और १९६४ से १९६९ का रिकॉर्ड मिस है। सरकारी जमीन को निजी लोगों के नाम पर दर्ज करने के केस की कोर्ट में सुनवाई चल रही है।
- झामसिंह इरकिरा, तहसीलदार