
Granite mine eliminated the life of the village
छतरपुर/लवकुशनगर। जिले के लवकुशनगर क्षेत्र के ग्राम मड़वा में पिछले करीब 20 सालों से चल रही किसान मिनरल्स ग्रेनाइट कंपनी ने यहां का ग्राम्य जीवन ही खत्म कर दिया है। करीब 5 हजार की आबादी वाले इस गांव में कंपनी ने जब काम शुरू किया, उससे पहले गांव के किसानों और अन्य ग्रामीणों को प्रलोभन दिया था कि उन्हें रोजगार मिलेगा, उनका जीवन स्तर सुधरेगा और चिकित्सा, शिक्षा से लेकर हर तरह की सुविधाएं गांव में ही उपलब्ध होंगी। लेकिन न तो गांव के लोगों को यहां रोजगार मिला और न ही उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य का कोई लाभ मिला। उल्टे कंपनी ने गांव के लोगों को पट्टे पर मिली जमीन खरीदकर बाकी बची जमीन पर भी कब्जा कर डाला है। अब गांव के लोगों को जीवन ग्रेनाइट की चट्टानों के बीच दम तोड़ता नजर आ रहा है।
पहले पट्टे की जमीन खरीदी, बाद में लीज करा ली :
किसान मिनरल्स कंपनी पर गांव के लोगों ने आरोप लगाया कि कंपनी के लोगों ने शासन से पट्टा में मिली जमीन उनसे खरीद ली और बाद में उसे शासन के नाम कराकर कंपनी के नाम लीज करा ली। गांव के सिद्धशरण विदुआ ने बताया कि गांव के लोगों को कंपनी ने रोजगार भी नहीं दिया। उल्टे गांव वालों की जमीन खरीदकर अपने कब्जे में ले ली। यहां तक कि खरीदी गई जगह से भी ज्यादा हिस्से में कब्जा करके खदान का मलवा किसानों के खेतों में डाला जा रहा है। चैनू बसंकार ने बताया कि कंपनी ने गांव में आने से पहले यहां के लोगों को बड़े सपने दिखाए थे। लोग भी खुश थे कि अब उनका गांव विकास की मुख्य धारा में शामिल हो जाएगा। ग्रेनाइट का उद्योग खुलेगा तो पूरे गांव को रोजगार मिलेगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। गांव के लोग देखते ही रह गए और बाहर के लोगों को यहां पर रोजगार दे दिया गया। गांव के लोगों को न स्वास्थ्य की जगह बीमारी मिली, रोजगार की जगह बेरोगजारी मिली और विकास की जगह पिछड़ापन मिला।
पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन गई खदान :
मढ़वा गांव की ग्रेनाइट खदान यहां के पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन गई है। खदान पर काम कर रहे मजदूरों ने बताया कि वे कई बार बीमार हो चुके हैं, लेकिन आज तक मेडिकल सुविधा नहीं दी गई। मजदूरी के अलावा किसी भी तरह की सुविधाएं उन्हें नहीं दी जा रही हैं। नियमानुसार खदान क्षेत्र में ग्रीन बेल्ट विकसित किया जाना चाहिए था, लेकिन कंपनी ने अपने रिकॉर्ड में ही इस पूरे क्षेत्र को हरा-भरा बता दिया है। जबकि जमीन हकीकत यह है कि खदान के आस-पास केवल पत्थर और मलबा के जंगल ही खड़े दिखाई दे रहे हैं। बीहड़ और रेगिस्तानी इलाके में यह पूरा क्षेत्र तब्दील हो गया है। वहीं ताज्जुब इस बात का है कि इतने सालों से पर्यावरण विभाग से इस खदान के संचालन के किए कंपनी को हर दो साल में स्वीकृति मिल जाती है। सवाल इस बात पर भी खड़े हो रह हैं कि बिना स्पॉट बैरीफिकेशन किए कैसे, क्या और किसके द्वारा पर्यावरण की स्वीकृति दी जा रही है।
दुर्घटनों को दबा देता है कंपनी प्रबंधन :
मढ़वा की ग्रेनाइट खदान में कुछ दिन पहले ही परसनिया गांव के एक मजदूर की करंट लगने से मौत हो गई थी। कंपनी ने इस मामले को दबा दिया। कुछ माह पहले खदान में ही काम करते हुए दो मजदूरों की अलग-अलग हादसे में मौत हो गई थी। वहीं एक मजदूर खदान के गड्ढे में भरे पानी के कारण भी डूबने से मर गया था। लेकिन इस सभी हादसों को दबा दिया गया। गांव के लोगों ने बताया कि खदान में इसलिए ही बाहरी लोगों को काम पर रखा जा जाता है, ताकि उनके साथ होने वाले हादसे को दबाया जा सके। अगर स्थानीय व्यक्ति हादसे का शिकार होता तो यहां के लोगों को पता चल जाता है। इसलिए कंपनी प्रबंधन खुद को सुरक्षित रखने के लिए यहां के लोगों को रोजगार नहीं देता है। जबकि गांव की खनिज संपत्ति को निकालकर कंपनी हर साल करोड़ों रुपए कमा रही है।
खदान के निरीक्षण के लिए जल्दी टीम भेजेंगे :
मढ़वा की ग्रेनाइट खदान पर काम करने वाले मजदूरों के हितों की होने वाली अनदेखी की जांच के लिए जल्द ही खदान पर टीम भेजी जाएगी। श्रम विभाग को भी इस बारे में जांच करने के लिए लिखाा जाएगा। पर्यावरण विभाग की अनुमति के बाद भी निर्धारित नियमों और मापदंड का पालन नहीं हो रहा है तो इसको लेकर भी कार्रवाई प्रस्तावित की जाएगी।
- देवेष मरकाम, जिला खनिज अधिकार छतरपुर
जो भी अच्छा होता है करते हैं :
अभी हमारी कंपनी घाटे में है, लेकिन कंपनी की तरफ से मजदूरों और ग्रामीणों की बेहतरी के लिए जो भी अच्छे से अच्छा होता है, करते हैं। अब हर नियम पूरा तो नहीं किया जा सकता है, लेकिन कोशिश पूरी होती है कि सबके हित में काम किया जाए। जो भी कमियां हैं उन्हें जल्दी दूर कर लिया जाएगा।
- विनोद खेडिय़ा, डायरेक्टर, किसान मिनरल्स मड़वा
Published on:
19 Sept 2018 12:11 pm
बड़ी खबरें
View Allछतरपुर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
