
सडक़ निर्माण के लिए काटे जा रहे पेड़
बुंदेलखंड में विकास और सुगम यातायात के नाम पर प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है, उसके भयावह परिणाम भविष्य में जलसंकट और भीषण गर्मी के रूप में सामने आने वाले हैं। छतरपुर जिले में नेशनल हाईवे और फोरलेन सडक़ों के जाल बिछाने के नाम पर अब तक करीब 1 लाख 41 हजार से अधिक हरे-भरे पेड़ों को बेरहमी से काट दिया गया है। वर्तमान में गुलगंज से अमानगंज के बीच बन रहे टू-लेन हाईवे के लिए पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर जोन और किशनगढ़ की घाटी में मशीनों से 50-50 साल पुराने विशालकाय पेड़ों को गिराने का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है।
नेशनल हाईवे-43 पर गुलगंज से अमानगंज तक 111 किलोमीटर लंबा हाईवे दो चरणों में बनाया जा रहा है। इसका पहला फेज गुलगंज से बराना नदी तक और दूसरा फेज अमानगंज तक प्रस्तावित है। इस सडक़ को चौड़ा करने की जद में बिजावर और किशनगढ़ के सघन वन क्षेत्र आ रहे हैं। यहाँ तेंदू, अर्जुन, जामुन, आम और सागौन जैसे बेशकीमती और फलदार पेड़ों को काटा जा रहा है। वन विभाग और पन्ना टाइगर रिजर्व की रेंजों से गुजरने वाले इस मार्ग के लिए अकेले 16321 पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई है, जिससे वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर भी खतरा मंडराने लगा है।
सागर-कानपुर फोरलेन निर्माण के दौरान छतरपुर जिले की सीमा में कुल 30607 पेड़ काटे गए हैं। इसमें सबसे अधिक विनाश हीरापुर के पास स्थित सांठिया घाटी में हुआ है, जहां घने जंगलों के बीच से सडक़ निकालने के लिए अकेले एक ही घाटी में 25377 पेड़ काट दिए गए। इसके अलावा बड़ामलहरा और गढ़ीमलहरा क्षेत्र में भी हजारों पेड़ सडक़ों की भेंट चढ़ गए।
सडक़ निर्माण कंपनियां नियमत: पेड़ काटने के बदले वृक्षारोपण का वादा करती हैं, लेकिन धरातल पर सच्चाई इसके विपरीत है। झांसी-खजुराहो फोरलेन के निर्माण के समय छतरपुर जिले में रिकॉर्ड 95 हजार पेड़ काटे गए थे। अनुबंध के अनुसार पीएनसी कंपनी को हाईवे के दोनों ओर सघन वृक्षारोपण करना था, लेकिन निर्माण पूरा होने के 5 साल बाद भी हाईवे के किनारे एक भी वृक्ष बनकर तैयार नहीं हुआ है। कंपनी द्वारा किए गए दावे केवल कागजों तक ही सीमित नजर आ रहे हैं।
पर्यावरणविदों का कहना है कि पेड़ों की इस बेतहाशा कटाई का सीधा असर क्षेत्र की जलवायु पर पड़ रहा है। बुंदेलखंड में अब गर्मी के दिनों में तापमान 48 डिग्री के पार पहुँचने लगा है और वर्षा चक्र पूरी तरह अनियमित हो गया है। जंगलों के सफाए से भू-जल स्तर गिर रहा है और मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है। यदि विकास के साथ-साथ इन पेड़ों की भरपाई नहीं की गई, तो आने वाली पीढिय़ोंं के लिए यह इलाका रहने लायक नहीं बचेगा।
सागर-कानपुर फोरलेन निर्माण में काटे गए वृक्षों के एवज में मुआवजा राशि का भुगतान वन विभाग और राजस्व विभाग को कर दिया गया है। झांसी-खजुराहो फोरलेन पर दोनों ओर तार फेंसिंग करा दी गई है, जिससे अब पौधों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।
देवेंद्र चापेकर, पीडी एनएचएआई
Updated on:
22 Feb 2026 10:48 am
Published on:
22 Feb 2026 10:46 am
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